‘आजकल मोहब्बत के लिए कोई नौकरी नहीं छोड़ता’, पढ़ें मशहूर लेखिका ममता कालिया का दिलचस्प इंटरव्यू

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हिंदी की प्रसिद्ध साहित्यकार
ममता कालिया की नई पुस्तक
” को ” पुरस्कार देने की घोषणा हो चुकी है। इसे ” में भी शॉर्टलिस्ट किया गया है। इस पुस्तक के बारे में उनसे बातचीत की कवि,
चित्रकार वाजदा खान ने। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के चुनिंदा अंश :

हाल में रवीन्द्र कालिया जी पर संस्मरणों की आपकी जो किताब’अंदाज-ए-बयां उर्फ रविकथा’आई, बेहद लोकप्रिय हुई। यह खूब पढ़ी जा रही है। मैंने भी पढ़ा, सम्मोहन में डूबी रही, तो कालिया जी की आपको सबसे खूबसूरत बात क्या लगी?तुमने पहले ही सवाल से मेरे सामने जीता जागता रवीन्द्र कालिया खड़ा कर दिया। कितना खूबसूरत इंसान था। मैं तो सबसे पहले उसके ऊंचे कद पर मोहित हो गई थी। हां, उसकी बातें इतनी मीठी नहीं थी, कभी-कभी मेरा दिल भी जलाती थीं। वह एक ऐसा इंसान था, जो न तो झूठ बोलता, न दूसरों के झूठ बर्दाश्त करता। जब मेरे भारत चाचा जी को पता चला कि मेरी दोस्ती रवींद्र कालिया के साथ हो गई है, तब उन्होंने एक ही बात कही कि रवीन्द्र के साथ अभी तक कोई स्कैंडल नहीं जुड़ा है। हंसी, इनकी स्मार्टनेस, बेतकल्लुफ दोस्ती और जीने का मलंग अंदाज मुझे बहुत अच्छा लगता था।

आपने इतने अनूठे और रोचक ढंग से संस्मरण लिखने की एक नई शैली की शुरुआत की है। इस विधा के बारे में कुछ कहें।हिंदी में प्रायः ऐसा होता है कि हर विधा का जल्द ही पक्का सीमेंटेड ढांचा बन जाता है। संस्मरण विधा का भी एक निर्धारित वास्तु बन गया है। जिसके अंतर्गत आप किसी महापुरुष के बचपन, यौवन, संघर्ष और सफलता तक की कथा कहते चलते हैं। अक्सर संस्मरण विशिष्ट व्यक्तियों के या महापुरुषों के ही होते हैं। मेरी इच्छा रवि को ना तो विशिष्ट बनाने की थी, ना ही महापुरुष। तमाम गड़बड़ियों सहित वह आदमी मुझे मिला था, जो चेन स्मोकर था, सुराप्रेमी था। दोस्तों का दिलदार था और नौकरी-चाकरी को अंगूठा दिखाने वाला था। मुझसे मिलने के दो महीनों के अंदर पक्की सरकारी नौकरी छोड़ टाइम्स ऑफ इंडिया की कच्ची नौकरी में चला गया। किसी रात मैं उनसे यह नहीं कह पाई कि कल से तुम भले मानस बन के जियो। दुनिया की निगाह में भला मानस वह होता है, जो जमकर नौकरी करे, इतवार को पत्नी को बाहर घुमाए, बच्चों को होमवर्क कराए, बैंक में रुपये जमा करने की सोचे और नौ बजे खाना खाकर आदर्श दंपति की तरह सो जाए। उनमें ऐसी एक भी खासियत नहीं थी। दिन भर वह प्रेस की दुनिया में मसरूफ रहते और शाम सात बजे हाथ मुंह धो, कपड़े बदल अपना दिन शुरू करते। ऐसे बेढब रोजनामचे में मुझे इस संस्मरण विधा की कायापलट तो करनी ही थी। मुझे जो-जो याद आता गया, लिखती गई। आलम यह कि रवि कथा किताब छप कर आ गई और कई बातें लिखने से छूट गईं। जिसे फिलहाल अगली किताब ‘शेष कथा’ में लिखूंगी।

अंदाज-ए-बयां उर्फ रवि कथा लिखने का ख्याल कब मन में आया?कभी नहीं सोचा था कि रविकथा किताब का रूप लेगी क्योंकि जनवरी 2016 में जब रवि दिवंगत हुए, तब मैं यकायक बहुत खाली और बीमार हो गई। मुझे सांस लेने में दिक्कत होने लगी। मन में आया कि मेरे लिखने-पढ़ने का कोई अर्थ नहीं बचा। बस दवा खाना और गम खाना, दो ही काम बचे थे। तद्भव के संपादक और रचनाकार अखिलेश हमारे पारिवारिक मित्र हैं, उन्होने मेरी हालत पहचानी। मुझसे कहा- आप रवि के बारे में कुछ लिखिए। मैंने कहा, ‘देखो कुछ भी लिखने की स्थिति में नहीं हूं, जिसके जाने से घर सूना हो गया, जीवन एकाकी हो गया, उसकी मुझे तकलीफ है, अभी कुछ याद नहीं आ रहा है।’ अखिलेश ने कहा, ‘जो महसूस हो रहा है, वही लिखिए। आप तकलीफ लिखिए।’ तब मैंने बड़े बेमन से रवि के उन आखिरी चार दिनों से गुजरते हुए उनकी पीड़ा याद की। इसलिए, तुम देखोगी कि रवि कथा के पहले दो अध्याय पीड़ादायक हैं। मुझे लगा कि यह तो बड़ी आंसू छाप कहानी बन रही है। मैंने झटके से खुद को सचेत किया और अपने आप से कहा, ‘यह तो असली रवीन्द्र कालिया नहीं हैं। सब जानते हैं असली रवीन्द्र कालिया एक खिलखिलाता हुआ, खुशमिजाज, दोस्ताना इंसान था। रवि जैसे थे, मैंने उसी तरह से उन्हें अपनाया। उन्होंने भी मुझे मेरी सारी लंतरानियों के साथ प्रेम किया। तभी तो मैंने लिखा है,’वह खरा इंसान था, दोस्तों का दोस्त, प्रेमियों का प्रेमी, मेरा संसार, साथी रचनाकार, मेरा सारा तीज त्योहार था। अनोखा चितेरा था। टेढ़ा था, पर मेरा था।’

आपकी इस रचना को पढ़कर पाठकों ने निश्चय ही प्रेम को कई नजरिए से जाना-समझा अनुभव किया होगा। आप प्रेम को किस तरह देखती हैं। आप अपने समय के प्रेम और आज के समय के प्रेम को किस तरह देखती हैं या क्या बदलाव पाती हैं?रवि कथा लिखते हुए मैं यह बात बार-बार सोच रही थी कि कहीं ये एक किस्म की मृत्यु कथा न बन जाए। रवि कथा दरअसल एक प्रेम कथा है। हम जीवन में प्रेम को बहुत लंबे समय तक किताबों के जरिए जिंदा रख सकते हैं। इतना मैं महसूस करती हूं कि प्रेम के तौर-तरीके बदलते जा रहे है। आज का समय ज्यादा पेचीदा और नुकीला है। हम अपने समय में नौकरियां छोड़कर एक-दूसरे के पीछे भागते रहे। आज नौकरियां इतने ऊंचे वेतन वाली हो गई हैं कि उन्हें कम से कम मुहब्बत के लिए छोड़ पाना मुश्किल है। कल और आज के प्रेमी में यही फर्क है कि कल का प्रेमी कुर्बान अली था और आज का प्रेमी, इंतजाम अली।