जब अटल बिहारी वाजपेयी ने वीपी सिंह से कहा- आप धमकी क्यों देते हैं?

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संतोष भारतीय, वरिष्ठ पत्रकार
उन्हीं दिनों ने पाया कि वे जब भी दिल्ली या बंबई में डायलिसिस करवाते हैं, तो उन्हें बुखार आ जाता है। उन्होंने पता किया कि सिर्फ उन्हें ही नहीं, सभी को, जो डायलिसिस करवाते हैं, बुखार आ जाता है। लेकिन जब वह विदेश में डायलिसिस करवाते हैं, चाहे लंदन हो या अमेरिका का कोई शहर, तब बुखार नहीं आता। उन्होंने भारत में डॉक्टरों से इसका कारण पूछा। डॉक्टरों का उत्तर था कि चूंकि पूरा खून शरीर से निकल कर मशीन में जाता है, वहां साफ होता है और फिर वहां से वापस शरीर में जाता है। इस प्रक्रिया में शरीर थक जाता है और बुखार आ जाता है। जबसे भारत में डायलिसिस शुरू हुआ है, तबसे ऐसा ही परिणाम निकल रहा है। उन्होंने लंदन में डॉक्टरों से इसका कारण पूछा। उन्हें उत्तर मिला कि किसी भी हालत में डायलिसिस के बाद बुखार नहीं आना चाहिए। पर भारत में डायलिसिस के बाद बुखार आता ही था।

वीपी सिंह ने लंदन के डॉक्टरों से इस सवाल पर काफी सोच-विचार किया, तब डॉक्टरों ने इसे रिसर्च का मुद्दा बनाया। उन्होंने डॉक्टरों और तकनीशियनों की एक टीम बनाई और उसे भारत भेजा। वह टीम दिल्ली, बंबई, चेन्नै और कलकत्ता गई और उसने पाया कि हर जगह डायलिसिस के बाद बुखार आ रहा था। टीम वापस लौटी। वह डायलिसिस में इस्तेमाल होने वाली सारी सामग्री साथ ले गई और लंदन की एक लैब में उसका परीक्षण किया, लेकिन कोई कारण नहीं पता चला। सामग्री में लंदन और भारत में कोई अंतर नहीं था। छह महीने सोचने-विचारने के बाद लंदन के डॉक्टरों के दिमाग में आया कि सिर्फ एक वस्तु की जांच नहीं हुई। वह था पानी। डायलिसिस में पानी का भी इस्तेमाल होता है।

पानी के नमूने ले गए लंदन
टीम फिर वापस लौटी और उसने देश के कई कोनों से डायलिसिस में इस्तेमाल होने वाले पानी का नमूना लिया। लंदन जाकर उसकी जांच की। उन्होंने पाया कि पानी ही इतना खराब है कि वह डायलिसिस के बाद मरीज को बुखार देता है। और तब वीपी सिंह को याद आया कि भारत के डॉक्टरों ने उन्हें बताया था कि भारत में औसतन तीन साल तक डायलिसिस होती है। उसके बाद मरीज या तो किडनी ट्रांसप्लांट करवा लेते हैं या किसी दूसरी पद्धति से इलाज करवाने लगते हैं। वीपी सिंह अब समझे कि तीन साल के बाद मरीज मर जाते हैं। उन्हें लगा कि सिर्फ पानी की वजह से डायलिसिस के मरीज मरें, यह अन्याय है और मरीजों की हत्या है। उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा कि वह अस्पतालों में शुद्ध पानी का इंतजाम करवाएं ताकि डायलिसिस से मरीजों की मौत न हो। लंदन की टीम ने पाया था कि देश में कोई भी पानी, चाहे मिनरल हो या पहाड़ों से सीधे लाया हुआ, अंतरराष्ट्रीय मानकों से बहुत कम है। उन्होंने प्रधानमंत्री को लिखे अपने दूसरे पत्र में फिर अनुरोध किया कि वह अस्पतालों में पानी की शुद्धता सुनिश्चित करवाएं अन्यथा वह सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका डालेंगे।

‘धमकी क्यों देते हैं?’
अटल जी ने उन्हें फौरन फोन किया और हंसते हुए कहा, ‘आप धमकी क्यों देते हैं, मैं करवा रहा हूं।’ चाहे सेना के अस्पताल हों, दिल्ली का मेडिकल इंस्टिट्यूट या तमाम बड़े निजी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, कहीं का पानी डायलिसिस के लिए उपयुक्त नहीं था। अपोलो अस्पताल के मालिक डॉ. प्रताप रेड्डी को वीपी सिंह ने पानी बदलने का अनुरोध किया। डॉ. रेड्डी ने फौरन लंदन के डॉक्टरों से बात कर जर्मनी से एक विशेष मशीन मंगवाई, जो डायलिसिस के लिए पानी साफ करती है। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एम्स में एक मशीन खरीदने का आदेश दिया और रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस ने सेना के दिल्ली स्थित अस्पताल में एक मशीन खरीदी। आज भी देश में जहां भी डायलिसिस होता है, खराब पानी का इस्तेमाल होता है और मरीज तीन साल के बाद हमारे बीच नहीं रहता। वीपी सिंह लगभग चौदह साल तक डायलिसिस करवाते रहे और हमारे बीच रहे। वह एक दिन डायलिसिस करवाते थे और दूसरे दिन लोगों के बीच किसी न किसी कार्यक्रम में चले जाते थे। उनकी प्राथमिकता में झुग्गी झोपड़ी और किसानों के सवाल हमेशा रहे।

पुड़िया में लिखा था भविष्य
1980 में संजय गांधी की हवाई जहाज उड़ाते दुर्घटना में मृत्यु हो गई, तब चंद्रशेखर को याद आया कि उन्हें कानपुर के एक ज्योतिषी लक्ष्मीकांत शुक्ला ने एक पुड़िया दी थी और कहा था कि आप इसे 23 जून को खोलिएगा। वह उठे और उस पुड़िया को तलाश किया। उन्होंने उसे खोला और पढ़ा जिसमें लिखा था, ’23 जून को देश का आने वाला समय बदल जाएगा।’ यही हुआ। संजय गांधी अगर जीवित रहते तो प्रधानमंत्री वही बनते क्योंकि राजीव गांधी की राजनीति में कोई रुचि नहीं थी। उन्हें तो संजय गांधी की अकाल मृत्यु राजनीति में ले आई ताकि वह अपनी मां की मदद कर सकें। लेकिन 1984 में श्रीमती गांधी की हत्या ने उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया। एक दिन मुझसे पं. लक्ष्मीकांत शुक्ला ने कहा था कि गांधी परिवार में एक साथ मां-बेटे का राजनीति में रहना संभव नहीं है। लेकिन लक्ष्मीकांत शुक्ला का कथन अधूरा ही सच हुआ। पिछले दस सालों से वरुण गांधी और मेनका गांधी सफलतापूर्वक राजनीति में हैं, और दोनों संसद में हैं। वैसे ही राहुल गांधी और सोनिया गांधी भी दोनों ही संसद में हैं।

( संतोष भारतीय की पुस्तक ‘वीपी सिंह, चंद्रशेखर, सोनिया गांधी और मैं’, प्रकाशक : वॉरिअर्स विक्ट्री से साभार)