कश्मीर को 90 के दशक में लौटाने की साजिश? गैर-कश्मीरी और हिंदू-सिखों की चुन-चुनकर हत्या

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नई दिल्ली
जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने के बाद कुख्यात ISI की बौखलाहट, अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे और घाटी में आतंक के नए चेहरे ‘द रेजिस्टेंस फोर्स’ के उभार के बीच जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का एक खतरनाक ट्रेंड चल रहा है। ये है टारगेटेड किलिंग का। निशाने पर सिविलियन हैं। उनमें भी बाहरी या फिर कश्मीरी पंडित। कुछ-कुछ वैसा ही ट्रेंड जब 90 के दशक में सूबे में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की विष बेल पैदा हुई थी और चुन-चुनकर कश्मीरी पंडितों की हत्याओं का दौर शुरू हुआ था। श्रीनगर के जाने-माने कश्मीरी पंडित माखन लाल बिंद्रू की कायराना हत्या का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि गुरुवार को श्रीनगर में ही स्कूल के भीतर दो शिक्षकों की गोली मारकर हत्या कर दी गई। पिछले एक हफ्ते में आतंकियों ने 7 आम नागरिकों की हत्या की है।

श्रीनगर के ईदगाह संगम इलाके में आतंकवादियों ने स्कूल के भीतर घुसकर प्रिंसिपल सतिंदर कौर और टीचर दीपक चांद को गोलियों से भून दिया। दोनों बाकी स्टाफ के साथ स्कूल परिसर में बाहर बैठे हुए थे। तभी हथियारबंद आतंकी आए। टीचरों से एक-एक कर उनका नाम पूछा। सतिंदर कौर और दीपक चांद को अलग कर उन्हें मार डाला। दअसल, 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने के बाद सुरक्षा बलों पर आतंकी हमले की घटनाओं में तो कमी आई है लेकिन सिविलियन पर आतंकी हमले बढ़े हैं। गैर-कश्मीरी मजदूरों की हत्या से शुरू हुआ सिलसिला बीजेपी नेताओं, सरपंचों से होते हुए अब कश्मीरी पंडितों के टारगेटेड किलिंग तक पहुंच चुका है।

पिछले 5 दिनों में 7 आम नागरिकों की हत्या, अल्पसंख्यकों में दहशत फैलाना मकसद
पिछले 5 दिनों में ही आतंकवादियों ने 7 आम नागरिकों की हत्या की है। दो दिन पहले ही मंगलवार को आतंकियों ने श्रीनगर के जाने-माने फार्मासिस्ट माखन लाल बिंद्रू की उनकी दुकान में गोली मारकर हत्या कर दी। बिंद्रू ने 90 के दशक में कश्मीरी पंडितों के सामूहिक पलायन के बाद भी श्रीनगर नहीं छोड़ा था। मंगलवार को ही आतंकियों ने बिहार के एक ठेले वाले वीरेंद्र पासवान और बांदीपुरा टैक्सी असोसिएशन के अध्यक्ष मोहम्मद शफी लोन की गोली मारकर हत्या कर दी। तीनों ही हत्याओं की जिम्मेदारी टीआरएफ ने ली है जिसे पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का ही फ्रंट माना जाता है। आम नागरिकों और उनमें भी खासकर हिंदू और सिखों की टारगेटेड किलिंग के जरिए आतंकवादी जम्मू-कश्मीर में रह रहे अल्पसंख्यकों में 90 के दशक जैसा ही दहशत फैलाना चाहते हैं।

इस साल आतंकी हमले में अबतक 25 सिविलियन की मौत
इस साल अबतक आतंकी हमलों में 25 सिविलियन की जान जा चुकी है। इस साल सबसे ज्यादा श्रीनगर में 10, पुलवामा और अनंतनाग में 4-4, कुलगाम में 3, बारामुला में 2, बडगाम और बांदीपुरा में 1-1 सिविलयन की आतंकी हमलों में मौत हुई है। ध्यान देने वाली बात यह है कि ज्यादातर मामले टारगेटेड किलिंग के हैं यानी आतंकियों ने पहले से अपना टारगेट तय किया हुआ था और उनकी हत्या कर दी। बम ब्लास्ट जैसी घटनाओं में आतंकियों का लक्ष्य ज्यादा से ज्यादा सुरक्षाकर्मियों या सिविलियन को मौत के घाट उतारना होता है लेकिन इन मामलों में चुन-चुनकर हत्या की गई।

सुरक्षा बलों के लिए नई चुनौती
अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबान के काबिज होने के बाद क्या जम्मू-कश्मीर में आतंकियों का दुस्साहस बढ़ा है? 2 साल पहले आर्टिकल 370 के तहत जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे के खत्म किए जाने के बाद से ही पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। उसकी बौखलाहट की बड़ी वजह यह भी है कि 5 अगस्त 2019 के बाद घाटी में सुरक्षा बलों पर आतंकी हमलों में कमी आई है। इसीलिए पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी ISI ने आतंकी घुसपैठ और हथियारों की सप्लाई बढ़ा चुकी है। हिंदू और सिखों में दहशत का माहौल हो, इसके लिए आतंकी टारगेटेड किलिंग कर रहे हैं। पाकिस्तान के नापाक इरादों की पोल पिछले महीने जिंदा पकड़े गए पाकिस्तानी आतंकी अली बाबर के कबूलनामे से भी होता है। उसे चंद रुपयों का लालच देकर पाकिस्तानी सेना ने ट्रेनिंग दी थी और भारत में हथियारों की सप्लाई के लिए घुसपैठ कराया। उरी में सुरक्षाबलों ने मुठभेड़ के बाद उसे जिंदा पकड़ लिया।

आर्टिकल 370 के ‘खात्मे’ के बाद आतंकियों के टारगेट पर आए सिविलियन
आर्टिकल 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को 5 अगस्त 2019 को मोदी सरकार ने खत्म किया था। उसके बाद आतंकवादियों ने बौखलाहट में सिविलियन पर हमले तेज कर दिए। अक्टूबर 2019 में आतंकियों ने 5 गैर-कश्मीरी मजदूरों की हत्या कर दी। छुट्टी के दौरान घर गए सेना और पुलिस के जवानों पर हमले तेज हुए। सरपंचों को निशाना बनाया जाने लगा। बीजेपी से जुड़े नेताओं को टारगेट किया गया। जून 2020 में अनंतनाग में कश्मीरी पंडित अजय पंडिता को उनके घर में गोलियों से भून दिया गया। वह सरपंच थे और कांग्रेस से जुड़े थे। अब आतंकियों की हिटलिस्ट में कश्मीरी पंडित और गैर-कश्मीरी टॉप पर हैं।

आर्टिकल 370 के खात्मे के बाद आतंकी हमलों में तो कमी लेकिन सिविलियन की मौत
जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने के बाद किस तरह सिविलियन आतंकियों के निशाने पर आए, उसे आंकड़ों के जरिए समझ सकते हैं। 2019 में जहां आतंकी हमलों में 36 सिविलियन की मौत हुई वहीं सुरक्षा बलों के 78 जवान शहीद हुए। 2020 में आतंकी हमलों में 33 सिविलियन मारे गए और सुरक्षा बलों के 46 जवान शहीद हुए।

संसद के पिछले मॉनसून सत्र के दौरान गृह मंत्रालय ने राज्यसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में बताया कि 2019 के मुकाबले 2020 में आतंकी हमलों में 59 प्रतिशत कमी आई। जून 2021 तक पिछले साल की उसी अवधि से तुलना में 32 प्रतिशत की कमी आई। मंत्रालय ने बताया कि 5 अगस्त 2019 को आर्टिकल 370 के खात्मे के बाद अगस्त 2021 तक आतंकी हमलों में कुल 59 सिविलियन की मौत हुई। इसके अलावा 168 सिविलियन जख्मी हुए।