चुनाव से पहले BJP ने क्यों बदला सीएम, क्या गुजरात में मुश्किल दिख रही राह? समझें

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नई दिल्ली
गुजरात में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने अपना चेहरा बदल दिया है। शनिवार को मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने अचानक राजभवन पहुंचकर अपना इस्तीफा सौंप दिया। न बीजेपी ने और न ही रुपाणी ने इस्तीफे का कोई ठोस कारण बताया है। हां, रुपाणी ने इतना जरूर कहा कि समय के साथ कार्यकर्ताओं के दायित्व बदलते रहते हैं। तो क्या रुपाणी का इस्तीफा एक तरह से बीजेपी का कबूलनामा है कि गुजरात सरकार ठीक काम नहीं कर रही थी? अगर सही काम कर रही थी तो सीएम क्यों बदले गए? विपक्ष भी यही सवाल उठा रहा है।

रिस्क उठा रही बीजेपी
चुनाव से पहले सीएम बदलना बीजेपी के लिए कोई नई बात नहीं है। हाल ही में बीजेपी ने उत्तराखंड और कर्नाटक में भी अपने मुख्यमंत्रियों को बदला है। ऐसा नहीं है कि चुनाव से पहले मुख्यमंत्री को बदलना मास्टर स्ट्रोक ही होता है, यह रिस्की भी बहुत है। सवाल तो उठेंगे ही कि अगर मुख्यमंत्री सही काम कर रहे थे तो बदला क्यों गया? गुजरात में विपक्ष ने घेरना भी शुरू कर दिया है। कांग्रेस नेता हार्दिक पटेल ने इसे राज्य सरकार के प्रति जनता की नाराजगी को दूर करने पैंतरा करार दिया है। येदियुरप्पा के मामले में तो बीजेपी ज्यादा उम्र का हवाला दे सकती है, लेकिन रुपाणी के मामले में तो यह बहाना भी चलेगा। राजनीति है ही परसेप्शन का खेल। अगर विपक्ष जनता में यह धारणा पुख्ता करने में कामयाब हो गया कि सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए चेहरे बदल रही है तो बीजेपी का यह दांव उल्टा भी पड़ सकता है। हालांकि, गुजरात में बीजेपी का यह दांव आजमाया हुआ है जिसमें उसे कामयाबी भी मिली है। 2001 में भी बीजेपी ने इसी तरह केशुभाई पटेल को हटाकर नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी थी। तब भूकंप के बाद तत्कालीन केशुभाई पटेल सरकार के प्रति लोगों में नाराजगी थी और कई उपचुनावों में बीजेपी को शिकस्त झेलनी पड़ी थी।

मुख्यमंत्री बदलने के पीछे रणनीति
चुनाव से पहले मुख्यमंत्री बदला ही इसीलिए जाता है कि अगर मौजूदा मुख्यमंत्री या सरकार के प्रति जनता में कोई नाराजगी है तो इससे दूर की जा सकती है। यह कुछ-कुछ वैसे ही कि चुनाव में मौजूदा विधायक या सांसद का टिकट काट दिया जाए ताकि उस उम्मीदवार को लेकर वोटरों की नाराजगी या असंतोष को दूर किया जा सके। लेकिन इसमें गुटबाजी का खतरा भी बना रहता है जिससे कभी-कभी लेने के देने पड़ जाते हैं। गुजरात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गृह राज्य है ही, साथ में बीजेपी का सबसे मजबूत गढ़ भी। यहां 1995 से ही यानी लगातार 26 सालों से वह सत्ता में है। ऐसे में बीजेपी हर हाल में गुजरात की सत्ता बरकरार रखना चाहती है। इसलिए सूबे में सीएम बदलने के आजमाएं हुए दांव पर एक बार फिर खेल रही है।

मोदी के पीएम बनने के बाद गुजरात में दोनों चुनाव से पहले बदले सीएम
संयोग से 2014 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद राज्य के दोनों विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री बदल दिए गए। मोदी के बाद आनंदीबेन पटेल सीएम बनीं लेकिन अगस्त 2016 में उन्होंने वैसे ही अचानक इस्तीफा दे दिया जैसे आज रुपाणी ने दिया। तब रुपाणी को मुख्यमंत्री बनाया गया। 2017 का चुनाव रुपाणी के चेहरे पर ही लड़ा गया जिसमें कांग्रेस ने कांटे की टक्कर दी लेकिन बीजेपी अपना गढ़ बचाने में कामयाब रही।

बीजेपी ने मान लिया कि इस बार गुजरात फतह आसान नहीं!
विजय रुपाणी के इस्तीफे से एक बात तो साफ है कि बीजेपी को अंदाजा हो गया है कि इस बार गुजरात फतह की राह आसान नहीं रहने वाली। 2017 के चुनाव में ही कांग्रेस ने बीजेपी को उसके सबसे मजबूत गढ़ में नाको चने चबवा दिए थे। 182 सीटों वाली विधानसभा में बीजेपी 100 का आंकड़ा भी नहीं छू पाई थी। तब आरक्षण की मांग को लेकर पाटीदारों में बीजेपी से नाराजगी थी और पाटीदार आंदोलन का उसे नुकसान पहुंचा था। तब पाटीदार आरक्षण आंदोलन के चेहरा रहे हार्दिक पटेल आज कांग्रेस के नेता हैं। गुजरात में बीजेपी के उभार के साथ ही पाटीदार वोट उसकी सबसे बड़ी ताकत रही है लेकिन अब कांग्रेस उन्हें अपने पाले में खींचने के लिए पूरा जोर लगा रही है। विपक्ष रुपाणी सरकार पर कोरोना महामारी से सही से न निपटने का भी आरोप लगा रहा था। अप्रैल-मई में दूसरी लहर के दौरान अहमदाबाद की स्थिति बहुत खराब थी। ऐसे में बीजेपी के लिए इस बार जीत की राह बहुत आसान नहीं है।

रणनीति के तहत ही रुपाणी को लाई भी थी बीजेपी
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात में बीजेपी के दो सबसे मजबूत वोट बैंक पाटीदार और ओबीसी में एक तरह से वर्चस्व की जंग छिड़ गई। तब सीएम आनंदी बेन पटेल बनाई गईं जो पाटीदार समुदाय से आती हैं। इससे ओबीसी में असंतोष बढ़ने लगा। चुनाव से एक साल पहले फरवरी 2016 में बीजेपी ने इसी गुटबाजी को खत्म करने के लिए प्रदेश अध्यक्ष की कमान एक ऐसे नेता को सौंप दी जो गैर-पाटीदार और गैर-ओबीसी थे। क्योंकि इन दोनों समुदायों में से किसी एक को कमान देने का मतलब था, दूसरे की नाराजगी में बढ़ोतरी। प्रदेश अध्यक्ष बनने वाला वह नेता कोई और नहीं, विजय रुपाणी ही थे। रुपाणी बनिया समुदाय से आते हैं। 6 महीने बाद ही आनंदी बेन पटेल की जगह वह मुख्यमंत्री बना दिए गए। तब भी यही रणनीति थी कि पार्टी में गुटबाजी की हवा निकाली जाए।