अब ‘जीरो’ हुई अफगान सेना, भारत में ट्रेनिंग ले रहे 150 जवानों का क्या होगा

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नई दिल्ली
अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे का असर सिर्फ वहां पर रहने वालों लोगों पर ही बल्कि भारत में मौजूद अफगानी लोगों पर भी देखने को मिल रहा है। देश में तालिबान के कब्जे के बाद अफगानी सेना लगभग जीरो हो गई है। इस वजह से वर्तमान में भारत में ट्रेनिंग ले रहे 150 से अधिक अफगान सैनिकों और मिलिट्री कडेट्स के भाग्य पर एक प्रश्न चिह्न लगा हुआ है।

रक्षा सूत्रों ने सोमवार को यह जानकारी दी कि भारत सरकार को देश में प्रशिक्षित किए जा रहे अफगान सैन्य कर्मियों का भविष्य पर फैसला लेना होगा। ट्रेनिंग लेने वालों में से अधिकांश देहरादून में भारतीय सैन्य अकादमी (IMA), चेन्नई में ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी (OTA) और खड़कवासला (पुणे) में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) में हैं।

एक सूत्र ने कहा कि आईएमए, ओटीए और एनडीए के कैडेटों के अलावा, कुछ अफगान अधिकारी और अन्य रैंक के सैन्यकर्मी भी भारत में विभिन्न सैन्य ट्रेनिंग प्रतिष्ठानों में उनके लिए विशेष रूप से तैयार कैप्सूल कोर्स में शामिल हैं। अफगान नेशनल डिफेंस और सुरक्षा बलों (ANDSF) के लिए तालिबान की ‘घृणा’ को देखते हुए अफगान कर्मी अपने परिवारों के बारे में चिंतित हैं। सूत्र ने कहा कि सैनिकों का प्रशिक्षण जारी है लेकिन वे स्पष्ट रूप से चिंतित हैं। भारत सरकार को उनके भविष्य पर फैसला करना होगा।

भारत की तरफ से अफगानिस्तान को चार एमआई-25 सशस्त्र हेलीकॉप्टर और तीन हल्के चीतल हेलिकॉप्टर सहित अन्य सैन्य साजोसामान की सप्लाई की गई है। इसके अलावा भारत ने अफगान नेशनल डिफेंस और सुरक्षा बलों को आतंकवाद विरोधी अभियानों, सिगनल, मिलिट्री फील्ड क्राफ्ट, सूचना तकनीक समेत अन्य फील्ड में ट्रेनिंग दी है। इसके अलावा महू के इन्फैंट्री स्कूल में यंग ऑफिसर्स कोर्सेज के अलावा मिजोरम में विशेष आतंकवाद विरोधी और जंगल युद्ध स्कूल में ट्रेनिंग भी दी गई है।

औसतन, लगभग 700 से 800 अफगान सैनिक प्रति वर्ष एक दशक से भी अधिक समय से विभिन्न भारतीय सैन्य प्रतिष्ठानों में उनके लिए शॉर्ट टर्म कोर्सेज में हिस्सा ले रहे थे। इसके अलावा हर साल आईएमए, ओटीए और एनडीए में 80-100 स्टूडेंट भी आर रहे थे। हालांकि हम अपनी सैन्य अकादमियों में भूटान, बांग्लादेश और श्रीलंका से लेकर वियतनाम, म्यांमार और ताजिकिस्तान तक कई अन्य देशों के कैडेटों को प्रशिक्षित करते हैं, लेकिन विदेशी कैडेटों में बड़ी संख्या में अफगान ही शामिल हैं।