मंडल दौर की वापसी के संकेत… 3.0 की आहट से है यह बेचैनी?

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नई दिल्ली
देश की सियासत में के संकेत दिखने लगे हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष मंडल राजनीति के बदले स्वरूप में अपना दबदबा हासिल करने के लिए एक के बाद एक सियासी दांव चल रहे हैं। कई क्षेत्रीय विपक्षी दल जातीय जनगणना करने और ओबीसी कमिशन की रिपोर्ट लागू करने का दबाव बनाकर पिछड़ों की राजनीति में पहल लेने की कोशिश कर रहे हैं। इनमें अधिकतर क्षेत्रीय दलों के नेताओं ने नब्बे के दशक में मंडल के दौर में अपनी स्थिति मजबूत की थी। दूसरी तरफ बीजेपी की अगुआई में इसे काउंटर करने की कोशिश भी उसी तत्परता से की जा रही है। पहले नीट की परीक्षा में ओबीसी को लंबित आरक्षण दिया और अब केंद्र सरकार ओबीसी के मसले पर एक और बड़ा फैसला ले रही है। वह इसके लिए संविधान में संशोधन करने की तैयारी में है। सूत्रों के अनुसार, संविधान में संशोधन कर ओबीसी जातियों की पहचान के लिए राज्यों को अधिकार दिया जाएगा। मौजूदा मॉनसून सत्र में ही सरकार इस बिल को पेश करके चौंका सकती है, लेकिन बदली सामाजिक सूरत में मंडल का नया दौर क्या उतना ही प्रभावी होगा, जितना नब्बे के दशक में था, इस पर अभी संदेह है।

कहां तक जाएगी बात
ओबीसी राजनीति के फिर से सामने आने के पीछे मूल मंशा यह है कि विपक्षी दल ओबीसी वोट में अपना वह दखल फिर से बढ़ाना चाहते हैं, जिसे बीजेपी ने उनसे हाल के सालों में छीना है। लेकिन इसके बहाने ओबीसी से जुड़े जो मसले निकल रहे हैं, उनके हल तलाशने होंगे। बीजेपी के लिए ऐसा करना आने वाले समय में चुनौतीपूर्ण होगा। जातीय जनगणना की मांग के पीछे क्षेत्रीय विपक्षी दलों का तर्क है कि ओबीसी को आबादी में उनके अनुपात के हिसाब से प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। नब्बे के दशक में मंडल कमिशन लागू होने के बाद से ओबीसी को सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण मिलता है। लेकिन दो साल पहले एक रिपोर्ट सामने आई, जिसमें कहा गया कि केंद्रीय कर्मचारियों में मात्र 12 फीसदी ओबीसी हैं। इनमें भी अधिकांश लाभ इनकी मजबूत जातियों को ही मिला है। फिर बीजेपी ने इसका रास्ता तलाशने के लिए ओबीसी को अलग-अलग कैटिगरी में बांटने की कोशिश की। कहा कि अब सरकार ओबीसी को 3 श्रेणियों में बांटेगी। तीनों के बीच 27 फीसदी के आरक्षण को उनके प्रतिनिधित्व के हिसाब से बांटा जाएगा। इसे बीजेपी का मंडल 2.0 माना गया। कहा गया कि अधिकतर पिछड़ी जातियों की मांग रही है कि 27 फीसदी आरक्षण में उनका हिस्सा नहीं के बराबर होता है और इसका लाभ मुट्ठी भर जातियां लेती हैं। इसके बाद सरकार ने ओबीसी की कई जातियों की पुरानी मांग को मानते हुए कमिशन का गठन किया। कमिशन का हेड रिटायर्ड जस्टिस जी रोहिणी को बनाया गया है।

इस कमिशन को ओबीसी की जातियों और उपजातियों की पहचान कर उन्हें अलग-अलग कैटिगरी में बांटना है। कमिशन का उद्देश्य ओबीसी में मौजूद कमजोर जातियों को नौकरियों में अधिक मौके उपलब्ध कराना है। लेकिन कमिशन को अपनी रिपोर्ट 2018 में देनी थी, उसे बार-बार टाला गया। आज तक इसकी रिपोर्ट नहीं आई। दरअसल, बाद में बीजेपी को खुद अपने ही मास्टर स्ट्रोक पर संदेह होने लगा। यहीं से विपक्षी दलों को दबाव बनाने का मौका दिखा। उधर, जब से गरीब अगड़ों को आरक्षण दिया गया, तब से ओबीसी के अंदर इस मसले पर अलग से तरीके से विरोध दिखा और साथ में मौका भी। तब से वे आबादी के प्रतिनिधित्व के हिसाब से आरक्षण को नए सिरे से तय करने की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क यह आया कि जिस तरीके से अगड़ों के लिए उनका कोटा 10 फीसदी तय किया गया, उसी हिसाब से अब उनके कोटे को भी बढ़ाया जाए। देश में सबसे अधिक तादाद ओबीसी की ही है। सवर्ण आरक्षण के बाद इनके कोटे को 27 फीसदी से बढ़ाने की मांग उठने लगी। इसके लिए जातीय जनगणना को सार्वजनिक कर हर जाति को उसके हिसाब से आरक्षण देने की मांग भी होने लगी है। तर्क है कि चूंकि पचास फीसदी से अधिक आरक्षण देने का रास्ता साफ हो गया है, ऐसे में अब इसे लागू करने में कोई बाधा नहीं है। जाहिर है, बीजेपी के लिए अब न तो इन मांगों को मानना आसान होगा, और न ही खारिज करना।

बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग
नरेंद्र मोदी की अगुआई में बीजेपी ने 2014 के बाद नए सिरे से सोशल इंजीनियरिंग की और ओबीसी को अपना सबसे मजबूत वोट बैंक बनाया। हिंदुत्व-राष्ट्रवाद के साथ पिछड़ी जातियों के लिए एक के बाद एक कदम उठाकर उनके बीच मजबूत पैठ बनाई। इससे पहले बीजेपी को उसके आलोचक और विरोधी शहरी या सवर्णों की पार्टी का टैग देते थे। इससे पार्टी को जनाधार बढ़ाने में दिक्कत होती थी। ओबीसी को साथ करने की मुहिम से इसमें बड़ा बदलाव आया। खासकर बिहार-उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में पार्टी के लिए चुनौती और बड़ी थी कि लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, मायावती और अखिलेश यादव जैसे नेता पहले ही इनके बीच अपनी पकड़ बना चुके थे। लेकिन बीजेपी ने इनका प्रभुत्व तोड़ने के लिए अपनी सोशल इंजीनियरिंग की।

दोनों राज्यों में गैर-यादव सभी पिछड़ी जातियों को एक जगह करने में बीजेपी ने पूरी ताकत लगाई और इसमें सफल भी हुई। बीजेपी ने ओबीसी के अंदर अब तक हाशिए पर रही जातियों के नेताओं को आगे बढ़ाया। दोनों राज्यों में बीजेपी के उभार के पीछे गैर-यादव पिछड़ी जातियों का ध्रुवीकरण सबसे बड़ा कारण माना गया। यूपी-बिहार के अलावा देश के अधिकतर बड़े राज्यों में इन्हीं पिछड़ी जातियों की तादाद सबसे अधिक है। बीजेपी ने खासकर हिंदी पट्टी के राज्यों में ओबीसी तबके के समर्थन से 2014 और 2019 के आम चुनाव में एकतरफा जीत हासिल की। विधानसभा चुनावों में भी अपना विस्तार किया। लेकिन इसके साथ ही उसे सवर्ण तबके का भी बड़ा समर्थन हासिल था। इसका भी बीजेपी के उभार में बड़ा योगदान था। ऐसे में बीजेपी अभी सामाजिक रूप से किसी तरह के बदलाव का जोखिम लेने से बचना चाहेगी। विपक्षी दलों को इसी कशमकश में मौका दिख रहा है। वे पिछड़ों की राजनीति को फिर से उभारने में लगे हैं।