असम-मिजोरम विवाद: सिर्फ केंद्र और SC निकाल सकते हैं समाधान, जानकार बोले- राष्‍ट्रपति शासन लागू हो

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नई दिल्ली एक बार फिर सुर्खियों में है। सोमवार को दोनों पूर्वोत्‍तर राज्‍यों के पुलिस बलों के बीच हिंसक झड़प और गोलीबारी में कम से कम छह लोगों की मौत हो गई। पुलिस अधीक्षक सहित 60 से अधिक जवान घायल हो गए। वहीं, विधि विशेषज्ञों की राय है कि असम-मिजोरम के बीच लंबे समय से चल रहे सीमा विवाद का समाधान या तो सुप्रीम कोर्ट या केंद्र कर सकता है। उन्होंने कहा कि सीमा पर हिंसक संघर्ष ‘विरोध की सबसे खराब अभिव्यक्ति है।’

एक विशेषज्ञ ने इस सीमा विवाद को ‘संवैधानिक तंत्र की नाकामी तक करार दिया। अधिकारियों के मुताबिक, मिजोरम से लगती ‘संवैधानिक सीमा’ की रक्षा करते हुए सोमवार को असम पुलिस के कम से कम पांच जवान मारे गए और पुलिस अधीक्षक सहित 60 से अधिक जवान घायल हो गए।

वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी और असम के स्थायी अधिवक्ता देबोजीत बोरकाकाती ने कहा कि केंद्र को मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए और विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के लिए कदम उठाने चाहिए। वहीं, एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे का मानना है कि दोनों राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करना चाहिए।

दवे ने कहा कि दोनों राज्यों में संवैधानिक व्यवस्था ध्वस्त हो गई है। हिंसक घटना आजादी के बाद से दोनों राज्यों के विद्रोह की सबसे कुरूप अभिव्यक्ति है।

दवे ने कहा, ‘अगर इन राज्यों को कोई शिकायत है तो उन्हें इसके समाधान के लिए उचित परिवाद सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करना चाहिए। यह उनका अधिकार है। उन्हें पहले न्यायालय का रुख करना चाहिए। एक-दूसरे के खिलाफ कुछ राहत का अनुरोध करना चाहिए। ’

उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर के इन राज्यों ने खुद बहुत खराब व्यवहार किया और ‘इन घटनाओं के बाद यह उचित होगा कि दोनों सरकारों को बर्खास्त कर राज्यों को राष्ट्रपति शासन के अधीन लाया जाए। ’

समाधान के दो विकल्‍प
संवैधानिक कानूनों के विशेषज्ञ द्विवेदी ने कहा कि राज्य दो विकल्पों को चुन सकते हैं। पहला, वे केंद्र सरकार से संपर्क करें और मामले का समाधान उचित तरीके और सहमति से संसद के कानून के जरिये करें।

उन्होंने कहा, ‘वे संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत सुप्रीम कोर्ट का भी रुख कर सकते हैं। लेकिन, कानूनी समाधान में समय लगेगा। इस बीच, केंद्र उच्च स्तरीय समिति का गठन कर राज्यों को साथ बैठकर समाधान तलाशने को कह सकता है।’

सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड देबोजीत बोरकाकाती ने कहा कि राज्यों को शीर्ष न्यायालय का रुख करना चाहिए, अगर वे ऐसा करना चाहते हैं। लेकिन, कानूनी प्रक्रिया में अधिक समय लगेगा।

उन्होंने कहा, ‘सीमा विवाद का समाधान कम समय में नहीं हो सकता क्योंकि इस प्रक्रिया में सबूत पेश किए जाएंगे और उनका मूल्यांकन होगा। लिहाजा, कानूनी समाधान पाने के बजाय राज्यों को फिलहाल अधिक संयम बरतना होगा ताकि मामला नियंत्रण से बाहर नहीं चला जाए।

सीआरपीएफ की आलोचना
सोमवार को हुई हिंसक झड़प के एक दिन बाद विवादित अंतर राज्यीय सीमा पर तैनात केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) को आलोचना का शिकार होना पड़ा। सीआरपीएफ एक तटस्थ बल के रूप में इस सीमा पर तैनात है। इस पर ‘दायित्व निभाने’ में विफल रहने का आरोप लगा।

मिजोरम के गृह मंत्री लालचमलिआना ने सीआरपीएफ पर आरोप लगाया कि उसने सोमवार को कोलासिब जिले के वैरेंगते के बाहरी इलाके में असम पुलिकर्मियों को मिजोरम में घुसने और राज्य पुलिस की ड्यूटी पोस्ट पर बलपूर्वक कब्जा करने की अनुमति दी। मिजोरम के एक मंत्री, एक स्थानीय विधायक और वैरेंगते के ग्राम परिषद अध्यक्ष ने भी सीआरपीएफ पर इसी प्रकार के आरोप लगाए।

कहां किसकी है तैनाती
पिछले साल अगस्त में सीमा पर हुए गतिरोध के बाद तनाव कम करने और शांति बहाली के लिए केंद्र सरकार ने मिजोरम-असम सीमा पर केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को तैनात किया था। मिजोरम की तरफ सीआरपीएफ, जबकि असम की तरफ लैलापुर में सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) को तैनात किया गया है। मिजोरम के गृह मंत्री ने कहा, ‘केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवान तटस्थ बल के रूप में हिंसक झड़प को रोकने और शांति कायम करने की अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहे हैं।’

क्‍या है आरोप?
लालचमलिआना ने दावा किया कि सोमवार को मिजोरम और असम के पुलिस बलों के बीच गोलीबारी के दौरान सीआरपीएफ के जवान कोलासिब के पुलिस अधीक्षक और कुछ पुलिस अधिकारियों को सुरक्षा देने में विफल रहे जब वे अर्धसैनिक बल के शिविर में सुरक्षा मांगने गए थे।

एक आधिकारिक बयान में कहा गया कि गृह मंत्री ने सीआरपीएफ के महानिरीक्षक सरबजीत सिंह से भी बात की और आग्रह किया कि वह इस मामले का संज्ञान लें और आवश्यक कार्रवाई करें। बयान के मुताबिक, सीआरपीएफ मिजोरम के कुछ पुलिस अधिकारियों के उन आरोपों की जांच करेगा जिसके अनुसार झड़प के दौरान उन्हें सुरक्षा देने से मना कर दिया गया।

मिजोरम के सूचना एवं जनसंपर्क मंत्री ललरुआतकिमा ने आरोप लगाया कि अर्धसैनिक बलों ने असम के पुलिसकर्मियों और लोगों को मिजोरम में घुसपैठ करने से नहीं रोका। वैरेंगते पर शिविर लगाए ललरुआतकिमा ने कहा, ‘अगर सीआरपीएफ कर्मियों ने असम पुलिस को मिजोरम के क्षेत्र में घुसने से रोक दिया होता तो यह खूनी झड़प नहीं होती।’ उन्होंने बताया कि सोमवार को जब दोनों राज्यों की पुलिस के बीच गोलीबारी हुई तब मिजोरम के निहत्थे पुलिस अधिकारी सीआरपीएफ के बेस पर गए लेकिन सीआरपीएफ ने उन्हें सुरक्षा नहीं दी।

क्‍या है असम-मिजोरम विवाद?
असम-मिजोरम का सीमा विवाद पुराना है। दरअसल, असम की बराक घाटी में कुछ जिले हैं। इनमें कछार, करीमगंज और हैलाकांडी शामिल हैं। इनकी 164 किमी सीमा मिजोरम के तीन जिलों से मिलती है। ये जिले हैं आइजोल,कोलासीब और मामित। पिछले साल अगस्‍त में क्षेत्रीय विवाद के बाद इस साल फरवरी में अंतरराज्यीय सीमा पर झड़पें हुई थीं। यह विवाद मिजोरम के कोलासीब जिले में झड़पों के बाद शुरू हुआ था। इसकी सीमा असम के हैलाकांडी जिले से लगी हुई है। तनाव कम करने और शांति बहाली के लिए केंद्र सरकार ने मिजोरम-असम सीमा पर केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को तैनात किया था।