कोरोना से मुक्ति के बाद भी डैमेज हो रहे कई अंग, अस्पतालों में बढ़ने लगे पोस्ट कोविड मरीजों की भीड़

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नई दिल्ली
कोरोना ने जिन लोगों को दूसरी लहर में अपना शिकार बनाया है, उन्हें ठीक होने के बाद भी कई तरह की परेशानियां हो रही हैं। कुछ लोग टीबी का शिकार हो रहे हैं, तो कुछ को ब्लैक फंगस हो रहा है। लोग लंग्स, हार्ट आदि की समस्याओं को लेकर भी अस्पताल पहुंच रहे हैं। अब कई अस्पतालों में पोस्ट कोविड के ऐसे केस सामने आ रहे हैं जिनमें मरीजों के लिवर में पस से भरे हुए फोड़े हो रहे हैं, जिसे लिवर एब्सेस भी कहा जाता है।

दिल्ली के बड़े-बड़े अस्पतालों में आने लगे मरीज
हाल ही में गंगाराम अस्पताल ने बताया था कि उनके अस्पताल में दो महीने में इस तरह के 14 केस आ चुके हैं। वहीं, अब हिंदूराव अस्पताल और राजीव गांधी कैंसर अस्पताल में भी इस तरह के कई मामले आ रहे हैं। हिंदूराव अस्पताल में रेडियॉलजी डिपार्टमेंट के डॉ. मोहित चौधरी का कहना है कि लिवर एब्सेस का पता अल्ट्रासाउंड से ही चलता है। पिछले एक महीने में यहां जितने अल्ट्रासाउंड किए गए हैं, उनमें से करीब 75 प्रतिशत मरीजों में लिवर एब्सेस देखा गया है। कुछ में यह कम होता है तो कुछ मरीजों में तीन-चार जगह कैविटी बनी होती है।

ज्यादातर मरीज कोरोना से रिकवर हुए
अहम बात यह है कि इनमें से ज्यादातर मरीज वह हैं जो कोरोना वायरस से रिकवर हुए हैं। इनमें से कुछ ऐसे थे जो होम आइसोलेशन में ही ठीक हो गए थे तो कुछ को इलाज के दौरान स्टेरॉयड दिया गया था। स्टेरॉयड की वजह से इम्युनिटी कम हो जाती है और इम्युनिटी कम होने की वजह से कई तरह की समस्याएं तेजी से घेर लेती हैं। ड्रेनेज के जरिए लिवर से पस को निकाला जाता है लेकिन यदि समय पर इसका ट्रीटमेंट ना किया जाए तो यह फट सकता है। ऐसे में जो पस है, वह हार्ट, लंग्स, पेट आदि में पहुंच सकती है और फिर इससे जान जाने का खतरा रहता है।

वहीं, राजीव गांधी कैंसर अस्पताल के इंटरवेंशनल रेडियॉलजी डिपार्टमेंट के कंसल्टेंट डॉ. अभिषेक बंसल का कहना है कि पहले ऐसे केस बेहद कम देखे जाते थे और अगर आते भी थे तो वह ज्यादातर एचआईवी के मरीजों में ही देखे जाते थे क्योंकि उनकी इम्युनिटी बेहद कम होती है। अब पिछले एक महीने में इस तरह के करीब 15 केस सामने आ चुके हैं और यह सभी मरीज कोरोना से रिकवर हुए थे।

पोस्ट कोविड में ही इन्हें लिवर एब्सेस हुआ है और इनमें से ज्यादातर वही हैं जिन्हें इलाज के दौरान स्टेरॉयड दिया गया था। कई मरीज तो ऐसे हैं जिनमें ड्रेनेज के लिए चार-चार पाइप तक लगाने पड़े हैं यानी इनमें तीन से चार अलग-अलग जगह पर पस भरी हुई थी। डॉ. अभिषेक बंसल का कहना है कि पस भरने पर इसका जल्द से जल्द इलाज करना बेहद जरूरी है। ड्रेनेज के जरिए पस को निकाला जा सकता है। अगर इलाज में देरी करते हैं तो यह रिस्की हो सकता है और जान जा सकती है।

क्यों हो रही है कोविड के बाद ऐसी परेशानियां
इस बारे में गंगाराम अस्पताल के इंस्टिट्यूट ऑफ लिवर गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एंड पैन्क्रियाटिकोबिलरी साइंसेज के चेयरमैन प्रफेसर अनिल अरोड़ा का कहना है कि पिछले दो महीने में हमने ऐसे 14 मरीजों का इलाज किया है। यह एंटअमीबा हिस्टोलिटिका नामक परजीवी के कारण होता है जो दूषित खाने और पानी से फैलता है। अस्पताल में आए मरीज 28 से 74 साल की उम्र के थे जिनमें 10 पुरुष और चार महिलाएं थीं। सभी मरीजों को बुखार और पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द था और तीन मरीजों में काले मल के साथ ब्लीडिंग भी थी। इनमें से आठ मरीजों को कोरोना के इलाज के दौरान स्टेरॉयड दिया गया था। छह मरीजों में जिगर के दोनों तरफ कई बड़े फोड़े थे, जिनमें से पांच मरीजों में बड़े फोड़े थे और सबसे बड़ा 19 सेमी आकार का था