जब फटॉग्रफर रघु राय से बोले पंडित भीमसेन जोशी- फोटो नहीं इसे तो संगीत कहते हैं

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नई दिल्ली
पद्मश्री से सम्मानित मशहूर के कैमरे में कैद पूरे भारत की तस्वीर देखी जा सकती है। भोपाल गैस त्रादसी हो या बांग्लादेश का युद्ध, दुनिया भर में उनकी खींची तस्वीरें खासी चर्चित रहीं। उनकी पहली फोटो एक बेबी गधे की थी, जो तब लंदन टाइम्स में छपी थी। फटॉग्रफी पर उनकी 55 किताबें आ चुकी हैं और दुनिया भर में उनकी तस्वीरों की प्रदर्शनी लगी है। जल्द ही उनकी बंगाल और बिहार से संबंधित एक पुस्तक आने वाली है। अपने कैमरे को हथियार और प्रफेशन को धर्म मानने वाले रघु राय से फटॉग्रफी से संबंधित अनेक पहलुओं पर
संध्या रानी ने बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश :

आपने इंदिरा गांधी सहित कई बड़े नेताओं की इन्फॉर्मल लाइफ शूट की है, ताकि उनका ह्यूमन फेस सामने आए। राजनीतिक चरित्रों पर ऐसी फटॉग्रफी आज भी होती है। पहले और अब में क्या फर्क देखते हैं?पहले और अब में जमीन-आसमान का फर्क हो गया है। आज के जमाने में एक तो सुरक्षा सबसे बड़ा कारण हो गया है। जब इंदिराजी प्रधानमंत्री थीं, तो हम 10-12 आदमी ऐसे थे, जो हमेशा उनके आस-पास होते थे। जब सुरक्षाकर्मी कुछ बोलते, तो हम लोग सीधे मिसेज गांधी से कहते थे कि देखिए, ये हम लोगों के साथ क्या कर रहे हैं। दरअसल, नजदीक रहने से ही तस्वीर बहुत अच्छी आती है। अब तो 20 साल से मैंने यह काम करना ही छोड़ दिया है, क्योंकि उसके बाद जितने भी प्रधानमंत्री आए, उनमें उस तरह की बात नहीं थी।

ब्लैक एंड वाइट और कलर फटॉग्रफी की डिबेट हालांकि पुरानी हो चली है, मगर आप दोनों मीडियम में काम करते रहे हैं। प्लीज बताएं कि तस्वीर जो कहना चाहती है, वह किस रंग में ज्यादा खुलकर कहती है?शादी-विवाह या कोई धार्मिक अनुष्ठान हो, तो उसमें रंगीन तस्वीरें देखने में अच्छी लगती हैं। लेकिन कोविड, मदर टेरेसा, किसान आंदोलन हो और उनकी फोटो रंगीन हो, तो वह मेन सब्जेक्ट से दूर होने लगती है, क्योंकि प्रत्येक रंग की अपनी अहमियत होती है। जब ब्लैक एंड वाइट में तस्वीर खींचते हैं, तो रंगों का शोर खत्म हो जाता है। पहले मैं अपने पास दो कैमरे रखता था। एक रंगीन, दूसरा ब्लैक एंड वाइट। अब तो कंप्यूटर की वजह से सब कुछ बहुत आसान हो गया है। अगर अच्छा नहीं लगा, तो चेंज कर लेते हैं। पहले ऐसी सुविधा नहीं थी।

जब आपने करियर शुरू किया था, तब आपको जो लिबर्टी ऑफ एक्सप्रेशन मिलती थी, क्या आपको लगता है कि आज के फोटो जर्नलिस्ट को उतनी लिबर्टी मिलती है?किसी को भी लिबर्टी नहीं मिलती है, बल्कि अपने काम के बलबूते पर लेनी पड़ती है और उसके लिए खूब मेहनत करनी पड़ती है। इस संसार में कुछ भी आसानी से नहीं मिलता। अब तो मैगजीन और न्यूजपेपर बहुत ही कमर्शल हो गए हैं।

स्मार्ट फोन में आए कैमरे को कैमरे का लोकतंत्रीकरण भी कहते हैं। आज हर हाथ में कैमरा है, ऐसे में तस्वीरों की दुनिया का कितना भला और कितना नुकसान हुआ है?अब सब लोग फटॉग्रफर बन गए हैं, क्योंकि अब अपने सेल फोन से आसानी से फोटो खींच सकते हैं। आजकल इंस्टाग्राम रंग-बिरंगी तस्वीरों से भरी हुई है, लेकिन उसमें कंटेंट नहीं है। जिंदगी की गहराइयों को समझकर उसको कैप्चर नहीं किया गया है। सेचुरेशन पॉइंट्स आते हैं, नए लेवल अचीव करने पड़ते हैं। लेकिन आज तो किसी के पास समय ही नहीं है, क्योंकि फास्ट फूड का जमाना है। फिर भी, अगर कंटेंट लाजवाब, एक्सप्रेसिव और एक्सक्लूसिव हो, तो कुछ भी चलेगा। सेल फोन से ही मैंने एक किताब बनाई है जिसका नाम है अमृतसर और उससे एग्जिबिशन भी की है। मैंने उस फोन से छह साल तक काम किया है। इसलिए ऐसा नहीं कह सकते हैं कि मोबाइल से काम नहीं होता है। आपके काम में गंभीरता होनी चाहिए।

लॉकडाउन ने दुनिया भर के फटॉग्रफर्स के सामने अनोखी चुनौती रखी है। इस चुनौती में आपने क्या किया?अब मैं 79 का हो गया हूं। कोविड की वजह से घरवाले मुझे बाहर नहीं निकलने देते हैं। फिर भी मैंने कुछ तस्वीरें ली हैं। लेकिन मैंने अपनी जिंदगी में इतनी बड़ी महामारी कभी नहीं देखी है। इस साल हम दूसरे फटॉग्रफर्स के साथ मिलकर एक एग्जिबिशन लगा रहे हैं।

हमने सुना है कि फटॉग्रफी के बाद आपका दूसरा पैशन म्यूजिक है। संगीतकारों से भी आपके अच्छे ताल्लुकात रहे..जब मैंने काम शुरू किया, तब म्यूजिक के सारे कंसर्ट मैं ही कवर करता था। उसी दौरान मैंने म्यूजिक पर एक पुस्तक निकालने की सोची। इसके लिए कई दिग्गज कलाकारों, जैसे एमएस सुब्बुलक्ष्मी, मलिक अली मंसूर आदि की फटॉग्रफी के लिए जाता, तो सबसे पहले उनसे संगीत सुनता। मैंने अनेक घरानों को सुना है। मलिक अली मंसूर की शिक्षा पांच घरानों से हुई थी। पंडित भीमसेन जोशी जब अमेरिका से लौटकर आए, तो यहां उनका प्रोग्राम था। मैं सामने बैठकर उन्हें सुन रहा था। वह मेरी आंखों में आंखें डाल कर राग मालकौश गा रहे थे। अंत में मैं उनसे मिला और कहा कि आपने बहुत अच्छा गाया, तो उन्होंने मैगजीन निकालकर दिखाते हुए कहा कि इसे फोटो नहीं, संगीत कहते हैं। ऐसे ही एक बार एस बालाचंद्रन का कार्यक्रम दिल्ली में हो रहा था। जब प्रोग्राम खत्म हुआ तो वह नीचे उतरकर आए और अपने गले का हार निकालकर मुझे पहना दिया। उसके बाद मैंने अपने गले से हार निकालकर उनकी वीणा पर रख दिया।