गुजरात के हरिपुरा गांव में ऐसा क्या खास? जहां अफगानी राजदूत को PM मोदी ने दी है जाने की सलाह

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सूरतभारत में अफगानिस्तान के राजदूत फरीद मामुन्दजई () इन दिनों अपने हिंदी प्रेम की वजह से हिंदुस्तानियों का दिल जीत रहे हैं। बुधवार को उनका एक ट्वीट काफी सुर्खियों में रहा जिसमें उन्होंने एक डॉक्टर के बारे में बताया जिसने उनसे कंसल्टेशन फीस नहीं ली, क्योंकि वह अफगानी राजदूत थे। फरीद के इस ट्वीट के बाद लोगों ने उन्हें अपने-अपने शहर/गांव आने की सलाह दी, इनमें से एक यूजर बलकौर ढिल्लों ने उन्हें अपने गांव हरिपुरा आने का न्यौता दिया। इस पर फरीद ने पूछा कि क्या गुजरात में सूरत का हरिपुरा गांव?

दरअसल बलकौर ढिल्लों राजस्थान के रहने वाले हैं और एक हरिपुरा उनके राज्य में भी है। मगर फरीद के इस ट्वीट को कोट करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरीद मामुन्दजई को अब गुजरात के सूरत स्थित हरिपुरा ( Village) जाने का भी न्योता दे दिया है। प्रधानमंत्री ने लिखा, ‘आप बलकौर के हरिपुरा भी जाइए और गुजरात के हरिपुरा भी जाइए, वो भी अपने आप में इतिहास समेटे हुए है।’

ऐतिहासिक है 1938 का प्रधानमंत्री के इस ट्वीट के बाद कई लोगों के मन में एक सवाल है कि आखिर गुजरात के हरिपुरा में ऐसा क्या है, जो प्रधानमंत्री ने अफगानी राजदूत को वहां जाने की सलाह दी है। सूरत के हरिपुरा का नेताजी सुभाष चन्‍द्र बोस (Netaji Subhash Chandra Bose) के साथ विशेष संबंध रहा है। 1938 के ऐतिहासिक हरिपुरा अधिवेशन () से पहले गांधी जी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सुभाष चंद्र बोस को चुना। यह कांग्रेस का 51वां अधिवेशन था। इसलिए अधिवेशन में शामिल होने आए कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चन्द्र बोस का स्वागत 51 बैलों से खींचे हुए रथ में किया गया।

हरिपुरा अधिवेशन में नेताजी ने दिया तूफानी भाषणहरिपुरा अधिवेशन में नेताजी का भाषण बहुत ही प्रभावी हुआ। यहां तक कहा जाता है कि शायद ही किसी भारतीय राजनीतिक व्यक्ति ने अब तक के इतिहास में इतना प्रभावी भाषण दिया हो। हालांकि गांधीजी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सुभाष को चुना तो, मगर उन्हें सुभाष की कार्यपद्धति पसन्द नहीं आई। इसी दौरान द्वितीय विश्वयुद्ध के बादल छाने लगे। सुभाष इंग्लैंड पर आए संकट का फायदा उठाकर भारत के स्वतन्त्रता संग्राम को तेजी देना चाहते थे, मगर गांधीजी इससे सहमत नहीं हुए।

मोदी ने लिखा, ‘मैं हरिपुरा के लोगों के स्नेह को कभी नहीं भूल सकता’इसी साल नेताजी की जयंती 23 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘पराक्रम दिवस’ के तौर पर मनाने की घोषणा की। नेताजी की जयंती के मौके पर हरिपुरा में इस साल एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। प्रधानमंत्री ने इस कार्यक्रम से एक दिन पहले अपने संदेश में कहा, ‘मैं हरिपुरा के लोगों के स्नेह को कभी नहीं भूल सकता, जो मुझे उसी सड़क पर एक विस्तृत जुलूस के माध्यम से ले गए, जिस सड़क पर नेताजी बोस 1938 में गए थे। उनके जुलूस में एक सजा हुआ रथ शामिल था जिसे 51 बैलों ने खींचा था। मैंने उस जगह का भी दौरा किया जहां नेताजी हरिपुरा में रुके थे।’

1968 में ताप्ती नदी में आई बाढ़, पूरा सूरत डूबा मगर हरिपुरा बच गयाताप्ती नदी के किनारे बसा सूरत शहर कई बार बाढ़ की विभीषिका झेल चुका है। साल 1968 में भी ऐसी ही एक बाढ़ आई थी, जिसमें पूरा शहर डूब गया था मगर हरिपुरा सुरक्षित रहा। दरअसल यह गांव भौगोलिक रूप से थोड़ी ऊंचाई पर स्थित है, इसलिए बाढ़ का पानी इसे छू भी न सका।