संपादकीय: मोबाइल फोन की खतरनाक दुनिया में गुमराह होती मासूमियत

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छत्तीसगढ़ में 12 साल के एक लड़के ने अपनी टीचर मां के बैंक अकाउंट से 3.2 लाख रुपये ऑनलाइन गेम के हथियार खरीदने पर खर्च कर दिए और मां को भनक तक नहीं लगी। जब अकाउंट से 3.2 लाख रुपये निकल जाने का अहसास हुआ, तब भी उन्होंने यही सोचा कि वह किसी ऑनलाइन फ्रॉड का शिकार हुई हैं। पुलिस ने ही प्राथमिक छानबीन के बाद सलाह दी कि वह अपने 12 साल के बेटे से पूछ कर देखें। जब बेटे से पूछा गया तो सारा राज बाहर आ गया। हालांकि बच्चों का मोबाइल में व्यस्त रहना और ऑनलाइन गेम्स खेलते रहना इतना आम हो गया है कि इसमें खास चौंकाने वाली कोई बात नहीं दिखती। लेकिन मासूम सी लगने वाली यह लत कितनी खतरनाक हो सकती है और इसके कैसे भयावह दुष्परिणाम झेलने पड़ सकते हैं, वह इस घटना से साफ होता है।

एकल परिवारों में अपनी दिनचर्या और काम की जिम्मेदारियों में फंसे मां-बाप बच्चों के लिए वक्त निकालने में अपनी असमर्थता की भरपाई मोबाइल से करने के आदी होते जा रहे हैं। नतीजतन बहुत कम उम्र में ही बच्चों के हाथों में मोबाइल पहुंच जाता है। इंटरनेट का इंद्रजाल उन्हें मोहित करता है और वे मां-बाप, भाई-बहन, नाते-रिश्तेदारों के संग-साथ की कमी ऑनलाइन गेम जैसे आसानी से उपलब्ध साधनों से पूरी करना सीख जाते हैं। लेकिन यहां कोई ऐसा नहीं होता जो उन्हें इसकी हदें बताए और इन हदों से आगे निकलने के खतरे समझाए। मां-बाप यह देखते हैं कि बच्चा अपने कमरे में मोबाइल के साथ है, लेकिन मोबाइल की उस खिड़की से कूदकर वह इंटरनेट की दुनिया में कहां पहुंचा हुआ है, इसका उन्हें अक्सर अंदाजा भी नहीं होता।

तमाम अध्ययनों की रिपोर्ट पहले से बताती रही हैं कि कम उम्र में मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल से बच्चों की उंगली, उनके पूरे शरीर और मन-मिजाज पर कितना बुरा असर पड़ता है। कोरोना और लॉकडाउन के चलते स्कूल कॉलेजों की बंदी ने जहां एक तरफ उन्हें पहले से ज्यादा अकेला कर दिया है, वहीं मोबाइल के साथ ज्यादा समय बिताने की मजबूरी बढ़ा दी है। जो पैरंट्स पहले बच्चों को मोबाइल पर बिजी देखकर असहज होते थे, वे भी अब इसे सहज मानने लगे हैं। लेकिन मौजूदा माहौल से उपजी मजबूरियों के बावजूद इसके खतरे कम नहीं हुए हैं। गेम के लिए हथियार खरीदना तो ऐसे खतरों का सिर्फ एक उदाहरण है। ब्लू व्हेल जैसे किसी घातक गेम का हिस्सा बनना और आतंकवादी तत्वों के बिछाए किसी जाल में फंसना भी इसका उतना ही स्वाभाविक प्रतीत होने वाला नतीजा हो सकता है। यही नहीं, वे फिशिंग का भी शिकार हो सकते हैं। इसलिए पैरंट्स को बच्चों की मोबाइल गतिविधियों को लेकर ज्यादा सतर्क होना होगा।