क्‍या विदेशी मीडिया ने भारत को बदनाम क‍िया? कोरोना के ये आंकड़े आंखें खोल देंगे

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कोविड-19 की दूसरी लहर से जूझ रहे भारत ने पिछले कुछ हफ्तों में बेहद भयावह दौर देखा। अस्‍पतालों में बेड्स और ऑक्सिजन की भारी कमी से लेकर वैक्‍सीन की किल्‍लत पर खूब रिपोर्ट्स छपीं। इस संकट की घड़ी में पूरी दुनिया के मीडिया का फोकस भारत पर था। पिछले एक माह में कोविड-19 से मौतों का आंकड़ा दिन-ब-दिन बढ़ता रहा।विदेशी मीडिया ने ऑक्सिजन के अभाव में सांसों के लिए तड़पते मरीजों की तस्‍वीरें छापीं। फिर श्‍मशानों में जलती चिताओं की कवरेज शुरू हुई। रिपोर्ट्स, तस्‍वीरें, वीडियोज से सोशल मीडिया पट गया। वैश्विक स्‍तर पर भारत की ऐसी कवरेज ने कई लोगों को आहत किया। कहा गया कि यह भारत की छवि खराब करने की कोशिश की है।हमारे सहयोगी टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने डेटा का एनालिसिस किया तो सामने आया कि विदेशी मीडिया ने जैसी कवरेज की, हालात उससे जुदा नहीं हैं।
Foreign Media On India’s Covid-19 Crisis: पिछले दिनों भारत ने कोविड-19 को लेकर जिस तरह के संकट का सामना किया, उसने विदेशी मीडिया में खूब सुर्खियां बटोरी। क्‍या ऐसा जान-बूझकर क‍िया गया या हालात वाकई में इतने खराब थे?
कोविड-19 की दूसरी लहर से जूझ रहे भारत ने पिछले कुछ हफ्तों में बेहद भयावह दौर देखा। अस्‍पतालों में बेड्स और ऑक्सिजन की भारी कमी से लेकर वैक्‍सीन की किल्‍लत पर खूब रिपोर्ट्स छपीं। इस संकट की घड़ी में पूरी दुनिया के मीडिया का फोकस भारत पर था। पिछले एक माह में कोविड-19 से मौतों का आंकड़ा दिन-ब-दिन बढ़ता रहा।
विदेशी मीडिया ने ऑक्सिजन के अभाव में सांसों के लिए तड़पते मरीजों की तस्‍वीरें छापीं। फिर श्‍मशानों में जलती चिताओं की कवरेज शुरू हुई। रिपोर्ट्स, तस्‍वीरें, वीडियोज से सोशल मीडिया पट गया। वैश्विक स्‍तर पर भारत की ऐसी कवरेज ने कई लोगों को आहत किया। कहा गया कि यह भारत की छवि खराब करने की कोशिश की है।
हमारे सहयोगी टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने डेटा का एनालिसिस किया तो सामने आया कि विदेशी मीडिया ने जैसी कवरेज की, हालात उससे जुदा नहीं हैं।
रोज आ रहे केसेज में से आधे भारत से, मौतें एक-तिहाई25 अप्रैल के बाद से हर दिन दुनियाभर से जितने मामले सामने आए, उनमें भारत का हिस्‍सा 40% से ज्यादा रहा। कुछ दिन तो 50% से भी ज्‍यादा। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन (WHO) का डेटा दिखाता है कि 4, 5, 10, 11 और 12 मई को भारत में बाकी पूरी दुनिया से ज्‍यादा केस दर्ज क‍िए गए। 4 मई के बाद से, दुनियाभर में कोविड से हुई मौतों में भारत का हिस्‍सा 30% से ज्‍यादा रहा है। यह सिर्फ वे आंकड़े हैं जो रिपोर्ट किए गए। कई एक्‍सपर्ट्स मानते हैं कि असल आंकड़े इससे कहीं ज्‍यादा हैं।
ग्‍लोबल केसेज में हमारे देश का सबसे ज्‍यादा हिस्‍सादुनिया में भारत के अलावा केवल एक देश ही ऐसा है जो डेली ग्‍लोबल केसेज में करीब 50% हिस्‍से के करीब आया था और वह है अमेरिका। 14 मार्च, 2020 से पहले जब दुनिया में रोज 10,000 के लगभग केस आ रहे थे जो चीन, साउथ कोरिया, जापान, थाइलैंड जैसे देशों ने भी 50% का आंकड़ा पार क‍िया था मगर वह महामारी की शुरुआत भर थी।
भारत में पीक के समय रेकॉर्ड पॉजिटिविटी रेट रहाअगर 5% से ज्‍यादा कोविड टेस्‍ट पॉजिटिव आते हैं तो इसका मतलब कि कुछ केसेज का पता नहीं चल रहा। अमीर देशों में पीक के दौरान भी पॉजिटिविटी रेट 20% से ज्‍यादा नहीं हुआ। अमेरिका में यह 15% से नीचे ही रहा लेकिन भारत में एक वक्‍त पॉजिटिविटी रेट 23% तक पहुंच गया था और करीब साढ़े तीन लाख केसेज रोज आ रहे थे। ऐसे में यह संभव है कि असल में पीक का आंकड़ा इससे भी ज्‍यादा हो। अर्जेंटीना और कोलंबिया जैसे देशों में पीक के दौरान इससे भी ज्‍यादा पॉजिटिविटी रेट रहा है लेकिन केसेज 20,000 से 30,000 के बीच ही रहे।
अमीर देशों में टीकों ने बचाई जिंदगियांकोविड से सबसे बुरी तरह प्रभावित 15 देशों के वैक्‍सीनेशन डेटा की कोविड केसेज से तुलना पर पता चलता है कि जहां वैक्‍सीनेशन रेट हाई था, वहां अब औसत केस कम आ रहे हैं। अमीर देशों में जहां 30% से ज्‍यादा आबादी को कम से कम एक डोज दी जा चुकी है, वहां 7 दिन के आधार पर डेली केसेज का औसत काफी हद तक कम हो गया है।
वैक्‍सीनेशन की धीमी रफ्तार ने भारत को रुला दियाभारत ने अभी तक केवल 10% आबादी को एक डोज लगी है। इतने कम वैक्‍सीनेशन रेट वाले देशों में वैक्‍सीनेशन और केसेज के बीच में कोई सीधा संबंध नहीं है। अर्जेंटीना, ब्राजील और भारत में पीक के मुकाबले केसेज का प्रतिशत ज्‍यादा है। हालांकि तुर्की, रूस और मेक्सिको में केसेज घटे हैं।