सांप्रदायिकता का छौंका, पहचान की राजनीति… इस बार क्यों बदला बंगाल का चुनावी रंग

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कोलकाता पश्चिम बंगाल में आठ चरणों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव () के लिए तैयारियों जोरों पर हैं। विभिन्न दलों के नेताओं का मानना है कि इस बार चुनाव में सांप्रदायिकता का छौंक लगेगा और पहचान आधारित राजनीति होगी। बंगाल में आमतौर पर चुनावी विमर्श विभाजनकारी एजेंडे से परे रहा है। पर जिस तरह तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी चुनाव से पहले ही एक-दूसरे पर सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने का आरोप लगा रहे हैं। इसके मद्देनजर इस बार के चुनाव सांप्रदायिक रंग में रंगते दिख रहे हैं।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में आने वाले पहले धार्मिक नेता अब्बास सिद्दीकी की अगुवाई में नवगठित इंडियन सेक्युलर फ्रंट के चुनावी मैदान में उतरने के साथ ही कई राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं। इसके साथ ही राज्य में धार्मिक पहचान आधारित सियासत की शुरुआत हो चुकी है। तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं सांसद सौगत रॉय ने कहा, ‘आजादी के बाद से जितने भी विधानसभा चुनाव हुए, उनके मुकाबले इस बारे के चुनाव अलग होंगे। बीजेपी की समुदायों के बीच विभाजन की लंबे समय से कोशिश कर रही है। लेकिन हम इसके खिलाफ लड़ेंगे और लोगों को एकजुट करने के लिए काम करेंगे।’

टीएमसी की तुष्‍टीकरण नीति से हुआ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण: बीजेपी
वहीं, बीजेपी नेतृत्व ने भी यह स्वीकार किया कि राज्य में सांप्रदायिक धुव्रीकरण बढ़ रहा है, लेकिन इसका दोषी उन्होंने तृणमूल और उसकी तुष्टिकरण की राजनीतिक को ठहराया। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा, ‘हमारे लिए तो चुनाव सभी के लिए विकास है। तृणमूल कांग्रेस सरकार की तुष्टिकरण की राजनीति और बहुसंख्यक समुदाय पर किए जा रहे अन्याय से बंगाल में निश्चित ही सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ है।’ बीजेपी नेता तथागत रॉय ने कहा कि बंटवारे के दाग और बंगाल में मुस्लिम पहचान वाली राजनीति के बढ़ने से सांप्रदायिक विभाजन गहरा गया है।

महंगाई, भ्रष्‍टाचार का भी चुनाव पर पड़ेगा असर: सीपीएम
सीपीएम के पोलित ब्यूरो सदस्य मोहम्मद सलीम ने कहा, ‘पहले (सीपीएम शासन के दौरान) यदि सांप्रदायिक विमर्श हावी होता तो भगवा दलों और अन्य चरमपंथी दलों ने अपना आधार बना लिया होता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह सच है कि इस बार दल सांप्रदायिक कार्ड खेल रहे हैं, लेकिन आम लोगों से जुड़े विषय जैसे कि ईंधन की कीमतों में बढोतरी, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी आदि का भी बहुत हद तक प्रभाव रहेगा।’ बंगाल में 27 मार्च से शुरू होकर आठ चरणों में चुनाव होने हैं।

‘दोनों समुदायों में संतुलन नहीं बना सकी टीएमसी’
बीजेपी के सूत्रों का कहना है कि बीते छह साल में तृणमूल की सरकार सांप्रदायिक दंगों पर काबू पाने में विफल रही है जिससे न केवल अल्पसंख्यकों का एक वर्ग नाराज है बल्कि बहुसंख्यक समुदाय के लोगों में भी रोष है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से वर्ष 2018 में जारी आंकड़ों के मुताबिक पश्चिम बंगाल में 2015 से सांप्रदायिक हिंसा तेजी से बढ़ी है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अब्दुल मन्नान ने कहा, ‘सत्तर के दशक तक आईयूएमएल, पीएमएल और भारतीय जन संघ जैसे दल कुछ सीटें जीतने में कामयाब रहे, लेकिन चुनावी अभियान सांप्रदायिक विमर्श पर केंद्रित नहीं थे। विकास संबंधी मुद्दे, राज्य और केंद्र सरकार विरोधी मुद्दे ही हावी रहे।’ चुनावी पयर्वेक्षकों का मानना है कि वाम दल ने समुदायों के बीच एक संतुलन कायम रखा था, लेकिन तृणमूल इसे कायम नहीं रख सकी।