जिनसे कांपता था पाक, जिन्होंने जिन्ना की हसरत नहीं की पूरी, उस जांबाज की कब्र जामिया में है जर्जर!

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‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालो का यही बाकी निशां होगा।’ मगर देश की राजधानी दिल्ली में भारत के जांबाज ब्रिगेडियर उस्मान की कब्र की दयनीय हालत देख मन गम और गुस्सा से भर जाएगा। 1947-48 की जंग में पाकिस्तानी सेना के दांत खट्टे करने वाले, नौशेरा के शेर कहे जाने वाले ब्रिगेडियर उस्मान के कब्र की हाल में जो तस्वीर आई, उस पर सेना ने नाराजगी जताई है। आइए जानते हैं देश के इस वीर सपूत से जुड़ीं कुछ खास बातें …
नौशेरा के शेर कहे जाने वाले ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान से पूरा पाकिस्तान खौफ खाता था। भारत की मिट्टी के इस लाल को मोहम्मद अली जिन्ना ने पाक सेना जॉइन करने का भी ऑफर दिया था लेकिन उन्होंने उसे ठुकरा दिया।
‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालो का यही बाकी निशां होगा।’ मगर देश की राजधानी दिल्ली में भारत के जांबाज ब्रिगेडियर उस्मान की कब्र की दयनीय हालत देख मन गम और गुस्सा से भर जाएगा। 1947-48 की जंग में पाकिस्तानी सेना के दांत खट्टे करने वाले, नौशेरा के शेर कहे जाने वाले ब्रिगेडियर उस्मान के कब्र की हाल में जो तस्वीर आई, उस पर सेना ने नाराजगी जताई है। आइए जानते हैं देश के इस वीर सपूत से जुड़ीं कुछ खास बातें …
यूपी के आजमगढ़ में हुआ था जन्मब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का जन्म 15 जुलाई, 1912 को ब्रिटिश भारत के आजमगढ़, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनके पिता मोहम्मद फारूक खुनाम्बिर पुलिस अफसर थे। उनकी मां का नाम जमीलन बीबी था। उन्होंने 1947-48 के भारत-पाक युद्ध में अहम भूमिका निभाई थी। उनकी बहादुरी भरे कारनामे के लिए उनको नौशेरा का शेर के नाम से पुकारा जाता था।
पिता चाहते थे बेटा सिविल सर्विस में जाए, लेकिन उन्होंने सेना को चुनाब्रिगेडियर उस्मान के पिता चाहते थे कि उनका बेटा सिविल सर्विस में जाए। लेकिन उन्होंने सेना को चुना। 19 मार्च, 1935 को उनकी नियुक्ति भारतीय सेना में हुई। उनको 10वीं बलूच रेजिमेंट की 5वीं बटालियन में तैनात किया गया। 30 अप्रैल, 1936 को उनको लेफ्टिनेंट की रैंक पर प्रमोशन मिला था। उन्होंने 10वीं बलूच रेजिमेंट की 14वीं बटालियन की अप्रैल 1945 से अप्रैल 1946 तक कमान संभाली।
ब्रिगेडियर उस्मान ने जान देकर झांगर को दुश्मन के कब्जे से कराया था आजादपाकिस्तान ने 1947 में कबायली घुसपैठियों को जम्मू-कश्मीर की देसी रियासत में भेजा। उनका मकसद उस पर कब्जा करना और पाकिस्तान में उसका विलय करना था। उस समय ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान 77वें पैराशूट ब्रिगेड की कमान संभाल रहे थे। ब्रिगेडियर उस्मान ने झांगर को दुश्मन के कब्जे से आजाद कराने का संकल्प लिया। उनका संकल्प तीन महीने बाद पूरा तो जरूर हुआ लेकिन उनकी जान की कीमत पर। ब्रिगेडियर उस्मान के अंतिम संस्कार में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू शामिल हुए थे। उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से नवाजा गया था।
दुश्मनों की बड़ी तादाद होने पर भी नहीं कांपा था भारत का शेरजनवरी-फरवरी 1948 में ब्रिगेडियर उस्मान ने नौशेरा और झांगर पर जोरदार हमले के दौरान घुसपैठियों को काफी नुकसान पहुंचाया। ये दोनों जम्मू-कश्मीर में रणनीतिक रूप से अहम स्थान हैं। दुश्मन बड़ी तादाद में थे जबकि भारतीय सैनिक उनके मुकाबले बहुत कम थे। इसके बावजूद पाकिस्तानी आक्रमणकारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। उनके करीब 2000 लोग हताहत हुए जिनमें करीब 1000 मारे गए और 1000 जख्मी हुए। इस हमले में सिर्फ 22 भारतीय सैनिक शहीद हुए और 102 जख्मी हुए। इस अभियान की वजह से उनको नौशेरा का शेर नाम से पुकारा जाने लगा। इसके बाद पाकिस्तानी सरकार ने ब्रिगेडियर उस्मान पर 50,000 रुपये का इनाम रखा था।
ठुकरा दिया था जिन्ना के पाकिस्तानी सेना में आने का ऑफरआजादी से पहले ब्रिगेडियर उस्मान बलूच रेजिमेंट में थे। जिन्ना और लियाकत अली खां ने उनको मुस्लिम होने का वास्ता दिया और पाकिस्तानी सेना में आने का ऑफर दिया। उनको पाकिस्तानी सेना का प्रमुख बनाने तक का वादा किया गया। लेकिन उन्होंने उस ऑफर को ठुकरा दिया। जब बलूच रेजिमेंट पाकिस्तान को दी गई तो ब्रिगेडियर उस्मान डोगरा रेजिमेंट में ट्रांसफर कर दिए गए।
सर्वोच्च बलिदान देने वाले ब्रिगेडियर उस्मान की कब्र टूटने से सेना नाराजसर्वोच्च बलिदान देने वाले शहीद ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान की कब्र की देखरेख नहीं की जा रही है। हाल ही में उनकी कब्र टूटी हुई मिली। सेना के मुताबिक यह कब्र जिस कब्रिस्तान में है वह दक्षिणी दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया के अधिकार क्षेत्र में आता है। जैसे ही भारतीय सेना को इस बात का पता चला तो उन्होंने जामिया विश्वविद्यालय से कब्र की मरम्मत कराने के लिए कहा।