जब-जब सियासी संकट में फंसी कांग्रेस, अहमद पटेल ने कहा ‘मैं हूं ना’

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नई दिल्ली
ठीक एक साल पहले की बात है। महाराष्ट्र में नाटकीय घटनाक्रम में बीजेपी-शिवसेना का गठबंधन टूट गया था। शिवसेना एनसीपी और कांग्रेस की मदद से सरकार बनाने की कोशिश कर रही थी। लेकिन कांग्रेस असमंजस में थी। मुंबई-दिल्ली के बीच मामला अटका हुआ था। बीच में ऐसा वक्त आ गया जब यह कोशिश भी लगभग विफल हो गई थी। चंद घंटे की बात थी और कांग्रेस-शिवसेना-एनसीपी का गठबंधन बनने से पहले टूटने वाला था।

कांग्रेस के अंदर कई तरह का मतभेद था। तभी कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष ने अहमद पटेल से बात की। उस बात के चंद घंटे के बाद सबकुछ साफ हो गया। दिल्ली से मुंबई तक गठबंधन पटरी पर आ गया और राज्य में सरकार अब तक चल रही है। जब कोई राजनीतिक मसला फंस जाए या कांग्रेस के अंदर कोई सियासी संकट आया हो, ऐसे सभी मसलों पर पिछले दो दशक से भी अधिक समय से अहमद पटेल पार्टी के लिए मैं हूं ना बने हुए थे।

पार्टी को कई बार मंझधार से निकाला
अनगिनत मसलों पर पार्टी को मंझधार से निकालने वाले पटेल जब बुधवार को अंतिम यात्रा पर निकले तो पार्टी के लिए उनकी जगह को भरना एक असंभव सा होगा। तमाम खेमों में बंटी कांग्रेस में कोई मीटिंग प्वाइंट था तो वह दिल्ली स्थित अहमद पटेल का घर था। देर रात को उनके यहां होने वाली मीटिंग में कई सियासी फैसलों की पटकथा लिखी गई। इसी सरल जब राजस्थान में गहलोत सरकार लगभग गिर गई थी तब अहमद पटेल को ही चीजों पर पटरी पर लाने का जिम्मा दिया गया और सभी बागी विधायक हरियाणा के होटल से निकले तो उनमें कुछ सबसे पहले अहमद पटेल से ही मिलने पहुंचे थे।

यूपीए के 10 सालों के शासन में अहमद पटेल रहे मजबूत स्थिति में
जब डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए दस सालों तक सत्ता में थी तब अहमद पटेल पार्टी के अंदर सबसे मजबूत थे। कांग्रेस अध्यक्ष और यूपीए संयोजक सोनिया गांधी की राजनीतिक सलाहकार के अलावा वह सबसे बड़े रणनीतिकार भी थे। जब कई राज्यों में कांग्रेस की सत्ता थी जो मुख्यमंत्रियों की तकदीर अहमद तय करते थे। एपी के नाम से मशहूर अहमद पटेल का पार्टी के अंदर इस वजूद की सबसे बड़ी वजह यह रही कि पिछले चार दशकाें के दौरान उन्होंने अपनी सीमा को समझा। पार्टी के एक सीनियर नेता ने कहा कि उनकी सही समझ ने उन्हें असीमित शक्ति दी।

गांधी परिवार के ताउम्र विश्वसनीय बने रहे
राजीव गांधी के गुड बुक में आने के बाद वह ताउम्र गांधी परिवार के सबसे विश्वासी बन गए। जब नब्बे के दशक में नरसिंह राव और सोनिया गांधी की दूरी बन गयी तो अहमद पटेल उसे पाटने के लिए पुल बनते थे। बाद में जब सोनिया गांधी सक्रिय राजनीति में आयी और पार्टी अध्यक्ष बनी तो दूसरे नेताओं तक पहुंचने के लिए वह पुल बने। 2003 में जब आम चुनाव से ठीक पहले जब सोनिया गांधी को यूपीए बनाने के लिए क्षेत्रीय दलों के साथ की जरूरत पड़ी तब भी अहमद पटेल पुल बने। उन्हें जो जिम्मेदारी मिलती गयी वह उसे पूरा करते रहे। बदले में अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को कभी उभरने नहीं दिया। नतीजा निकला कि सोनिया गांधी ने उन्हें लभग अपनी सारी ताकत दे रखी थी। पार्टी में वही होता था जो एपी चाहते थे।

अहमद पटेल कभी केंद्र में मंत्री नहीं बने और वह जो करते सोनिया को विश्वास में लेकर करते। कुछ मौकों पर उनकी सलाह को दरकिनार भी किया गया लेकिन उन्होंने इसका बुरा नहीं माना। कहा गया कि यूपीए सरकार के बाद के दिनों में कुछ नेता मजबूत हो गये थे और वे अहमद पटेल वाले रूट को मानने से मानने में हिचकते थे। तब भी इसका बुरा नहीं माना। लेकिन पहली बार अहमद पटेल तब असहज हुए जब पार्टी के अंदर न सिर्फ नेतृत्व बल्कि जनरेशन परिवर्तन भी हुआ।

राहुल के नेतृत्व में पूछ हुई कम
राहुल गांधी के अध्यक्ष पद संभालने के बाद उनकी पूछ अपेक्षाकृत कम हुई। लेकिन अहमद पटेल तब भी पहले की तरह अपनी सीमाओं को समझ कर बिना शिकायत टिके रहे। नतीजा यह हुआ कि हाल के समय में जब राहुल गांधी के दोबारा अध्यक्ष बनने की बात उठी है,अहमद पटेल पहले की अपेक्षा उनके अधिक करीब हो गये थे। 1977 में मात्र 31 साल की उम्र में जनता लहर के बीच गुजरात चुनाव जीतने वाले अहमद पटेल लगातार तीन बार जीते। लेकिन1989 में गुजरात में लोकसभा चुनाव हारने के बाद वह दिल्ली में पार्टी के सबसे विश्वासी खिलाड़ी बने रहे।

अभी भी जब पार्टी सबसे खराब दौर से गुजर रही है,कई खेमों में बंटती दिख रही है,विभाजन का खतरा झेल रही है,शीर्ष नेताओं से लेकि जूनियर नेताओं तक एक ही आवाज आती थी-अहमद भाई जल्द ठीक होकर आएंगे,सब ठीक हो जाएगा। लेकिन अहमद पटेल ठीक होकर नहीं लौटे। पार्टी के ” मैं हूं ना” अहमद पटेल का सहारा नहीं लड़ा। अब इसे अपनी जंग खुद लड़नी होगी।