जेल में कैद अनंत सिंह कैसे बने पांचवी बार विधायक, जानें जुर्म की दुनिया से सियासत तक की दास्तां

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पटना
बिहार के बाहुबली राजनेता जेल में कैद होने के बावजूद विधानसभा चुनाव जीत गए हैं। आरजेडी की टिकट पर मोकामा से चुनाव लड़ रहे अनंत सिंह ने जेडीयू उम्मीदवार राजीव लोचन को 35 हजार से ज्यादा मतों से हराया है। लगातार पांचवी बार विधायक बने अनंत सिंह के ऊपर 38 केस दर्ज हैं। 2019 में उनके घर से एके-47 और बम भी मिला था। जिसके बाद उन्हें काफी दिनों तक फरारी काटने के बाद आत्मसमर्पण करना पड़ा था। मोकामा में अनंत सिंह का इतना रसूख है कि उन्हें यहां के लोग छोटे सरकार के नाम से जानते हैं।

मोकामा में क्यों चुनाव जीत जाते हैं अनंत सिंह?
अनंत सिंह भूमिहार समाज से आते हैं। मोकामा विधानसभा क्षेत्र भूमिहार बाहुल्य है। इसके अलावा इस इलाके में गरीबी अपने चरम पर है। ऐसे में अनंत सिंह की रॉबिनहुड वाली छवि यहां काम कर जाती है। उदाहरण के लिए इलाके में अगर दहेज के लिए किसी लड़की की शादी नहीं हो रही है और उसका पिता अगर अनंत सिंह ड्योढ़ी पर चला जाता है तो उसे खाली हाथ नहीं लौटना होगा। या तो अनंत सिंह लड़के वाले को डरा धमकाकर शादी के लिए तैयार कर देते हैं या फिर कुछ खर्चा पानी देकर मामले को सुलझा देते हैं। इसी तरह किसी ने अगर अनंत सिंह को शादी का कार्ड भेज दिया तो वे उसके घर उपहार जरूर भेजते हैं। गांव में अगर अनंत सिंह आए हैं और किसी ने मुखिया की शिकायत कर दी तो छोटे सरकार उसी वक्त सरेआम फटकार लगा देते हैं। यही सब वजह है कि इलाके के लोग अनंत सिंह को सपोर्ट करते आ रहे हैं।

नीतीश को चांदी के सिक्कों में तौलकर राजनीति में आए अनंत
हठी स्वभाव के अनंत सिंह ने उस दौर में बिहार के सबसे पावरफुल शख्स लालू यादव का प्रस्ताव ठुकराकर नीतीश कुमार के साथ गए। इतना ही नहीं, बाढ़ शहर में एक भव्य कार्यक्रम आयोजित कर नीतीश कुमार को लड्डू और चांदी के सिक्कों से तौलकर अनंत सिंह ने अपनी राजनीतिक करियर के शुरुआत का ऐलान किया। लालू का प्रस्ताव ठुकराने पर तत्कालीन राबड़ी देवी की सरकार के इशारे पर अनंत सिंह के पुश्तैनी आवास पर बिहार पुलिस की स्पेशल टीम ने रेड मारी। अनंत सिंह को भारी नुकसान उठाना पड़ा, लेकिन उसका इरादा नहीं डगमगाया।

नीतीश के सुशासन पर ‘दाग’ लगाते रहे अनंत सिंह
इस घटना के बाद अनंत सिंह नीतीश कुमार के दुलारे और लालू के लिए किरकिरी बन गए। 2005-2010 के दौर में नीतीश सरकार ने राज्य के लगभग सारे बाहुबलियों को जेल में ठूंस दिया या तो राज्य से बाहर जाने को विवश कर दिया। लेकिन अनंत सिंह का रुतबा बढ़ता गया। साहब के सानिध्य में मोकामा का यह बाहुबली विधायकी की कुर्सी पर बना रहा और राज्य में तमाम जगह संपत्ति हड़पता गया। सुशासन बाबू के राज में अनंत सिंह पर पटना के फ्रेजर रोड इलाके में मॉल बनाने के लिए जमीन कब्जाने के आरोप लगे। लेकिन इसमें अनंत सिंह पर कोई मुकदमा दर्ज नहीं हुआ।

पुटुस यादव हत्याकांड के बाद राजनीति में हाशिए पर जाने लगे अनंत सिंह
इसी बीच साल 2014 में बाढ़ में छेड़खानी को लेकर युवकों के दो गुटों में विवाद शुरू हुआ था। बाढ़ कॉलेज मोड़ के निकट इसी क्रम में मारपीट हुई। बाद में भूषण, कन्हैया, ऋषि, मनीष, शिवम समेत अन्य ने चार युवकों पुटुस कुमार, प्रदीप, सोनू और बबलू का अपहरण कर लिया था। दूसरे दिन 18 जून को लदमा गांव के पास खेत में पुटुस की लाश मिली थी। इसी हत्याकांड में विधायक अनंत सिंह का नाम आया था। अनंत सिंह पर लगे अपराध के यही आरोप उन्हें राजनीति में हाशिए पर ले जाने लगे।

अनंत को विलेन बना लालू बने सामाजिक न्याय के मसीहा
2015 के विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने हाथ मिला लिया था। इसके बाद लालू यादव बिहार के लगभग हर रैली में इस बात का जिक्र करते की भूमिहार नेता अनंत सिंह ने यादव युवक पुटुस कुमार पर हाथ डाला था, जिसके परिणाम स्वरूप वह जेल की हवा खा रहा है। अपने इस एक बयान से लालू यादव ओबीसी और पिछड़े लोगों को संदेश देने की कोशिश कर रहे थे कि वे सामाजिक न्याय के सबसे बड़े मसीहा वही हैं। इसके अलावा लालू की पार्टी ने किसी भी भूमिहार नेता को एक भी टिकट नहीं दिया था। इसका लालू की पार्टी को जबरदस्त फायदा भी हुआ। हालांकि इस चुनाव में भी अनंत सिंह अपनी रॉबिनहुड छवि की वजह से निर्दलीय मोकामा से विधायक बन गए।

नीतीश से दूरी के बाद जेल से अंदर बाहर हो रहे अनंत सिंह
इसी बीच नीतीश कुमार ने लालू से नाता तोड़ लिया और फिर से बीजेपी के साथ सरकार चलाने लगे। लेकिन अनंत सिंह हाशिए पर ही बने रहे। नीतीश कुमार कुमार ने उन्हें भाव देना बंद कर दिया। इस दौरान अनंत सिंह जेल के अंदर बाहर होते रहे। बाढ़ के नदवां गांव स्थित अनंत सिंह के पैतृक घर में पिछले साल 16 अगस्त को पुलिस ने छापेमारी की थी। उनके घर से एक एके 47 राइफल, दो हैंड ग्रेनेड, मैगजिन में भरे हुए 26 जिंदा कारतूस बरामद हुए थे। इस मामले में उनके खिलाफ यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया गया था। इस मामले में विधायक अनंत सिंह ने दिल्ली के साकेत कोर्ट में आत्मसमर्पण किया था।

डर का साम्राज्य बचाने को चाहते हैं सत्ता
2019 के लोकसभा चुनाव में अनंत सिंह ने अपनी पत्नी को कांग्रेस के टिकट पर मुंगेर लोकसभा सीट से नीतीश कुमार के प्रिय ललन सिंह को चुनौती दे दी थी। अनंत सिंह की पत्नी चुनाव तो नहीं जीत पाईं, लेकिन उल्टा अपने पुराने साहब से रिश्ता और ज्यादा खराब कर लिया। अब अनंत सिंह ने आरजेडी से टिकट मिलने की बात कह रहे हैं। लेकिन इस पर आरजेडी के किसी भी बड़े नेता ने अभी तक कुछ नहीं कहा है। अनंत सिंह के बयान को देखकर तो यही लगता है कि वह किसी भी सूरत में सत्ता चाहते हैं ताकि अपने साम्राज्य को बचा सकें, वरना वह भी जानते हैं कि नीतीश कुमार जैसे नेता के सामने वह कितने दिन टिक पाएंगे।

क्यों कड़क है मोकामा की राजनीतिक धरती
मोकामा विधानसभा सीट का अधिकतर हिस्सा ग्रामीण इलाका है। यहां भूमिहार समाज निर्णायक वोटर हैं। इसलिए यहां चाहे जिस पार्टी का प्रत्याशी जीत दर्ज करे, लेकिन वह भूमिहार ही होता है। 1990 से 2000 तक यहां से अनंत सिंह भाई दिलीप सिंह विधायक रहे। दिलीप सिंह लालू प्रसाद यादव की कैबिनेट में मंत्री भी रहे। साल 2000 में नीतीश कुमार के समर्थन से निर्दलीय बाहुबली सूरजभान सिंह जेल में रहते हुए चुनाव में उतरे और जीते। इसके बाद 2005 और 2010 में नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी से अनंत सिंह को प्रत्याशी बनाया और दोनों बार ही इनकी ही जीत हुई। 2015 में अनंत सिंह ने निर्दलीय जीत दर्ज की है। आजादी के बाद से ही मोकामा विधानसभा सीट अस्तित्व में है। अब तक यहां 16 बार विधानसभा चुनाव हुए हैं, जिसमें एक उपचुनाव भी है। 1972 और 1977 में यहां से उस दौर के भूमिहारों के बड़े नेता कृष्णा साही दो बार चुनाव जीते। इसके बाद श्याम सुंदर सिंह 1980 और 1985 में दिलीप सिंह जैसे बाहुबली के बल पर यहां से चुनाव जीता। जब श्याम सुंदर सिंह ने दिन के उजाले में दिलीप सिंह जैसे गुंडे से मिलने से मना कर दिया तो दिलीप सिंह इस सीट से लालू की पार्टी के टिकट पर उतरे और दो बार विधायक और मंत्री भी बने। यानी इस सीट पर हमेशा भूमिहार नेता ही विधायक बनता रहा है। साथ ही टाल क्षेत्र की मिट्ठी जिस तरह सख्त होती है ठीक उसी तरह यहां हमेशा सख्त नेता ही विधायक बनते रहे हैं।