Explainer : नए जमीन कानून के बाद क्या जम्मू-कश्मीर ‘FOR SALE’ है? समझिए असल हालात

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श्रेयांश त्रिपाठी, श्रीनगर
जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के अंत के बाद सरकार का एक और फैसला लागू हो गया है। दो दिन पूर्व अधिसूचित भूमि कानून के बाद अब जम्मू-कश्मीर में देश के किसी भी हिस्से में रहने वाला इंसान जमीन खरीद सकता है। भले ही इस फैसले को लेकर देश के अन्य हिस्सों में खुशी दिखती हो, लेकिन कश्मीर घाटी की तमाम राजनीतिक पार्टियों का कहना है कि इससे जम्मू-कश्मीर पर ‘FOR SALE’ वाला टैग लग जाने वाला है। विरोध करने वालों में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती भी शामिल हैं, जिनका कहना है कि अगर ऐसा होता है तो इससे जम्मू-कश्मीर के डेमोग्राफी पर असर पड़ेगा। दूसरी ओर केंद्र के फैसले का विरोध चाहे जितना हो, लेकिन ये सच है कि बीते 50 साल से अभी अधिक समय से राज्य की डेमोग्राफी में कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ है।

दरअसल, जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 और 35ए के हटने से पहले से ही राज्य की तमाम राजनीतिक पार्टियां केंद्र सरकार पर यहां की डेमोग्राफी से छेड़छाड़ करने का आरोप लगाती रही हैं। इन पार्टियों की ओर से पूर्व में ही यह कहा जा चुका था कि अगर 370 का अंत होता है तो जम्मू-कश्मीर में बाहरी लोगों का दखल बढ़ेगा और इससे राज्य की डेमोग्राफी प्रभावित होगी। डेमोग्राफी में बदलाव के पीछे जो आशंकाएं थीं वो ये कि घाटी में मुस्लिम जनसंख्या का प्रतिनिधित्व हिंदुओं के सापेक्ष कम होगा। अगर वर्तमान स्थिति पर गौर करें तो 2011 की जनसंख्या के अनुसार, जम्मू-कश्मीर राज्य की कुल मुस्लिम आबादी 85.67 लाख रही है। वहीं हिंदुओं की जनसंख्या राज्य में 35.66 लाख है, जो कि कुल जनसंख्या 1.25 करोड़ का कुल 28.43 प्रतिशत है। वहीं मुस्लिम आबादी का प्रतिशत 68.3 है।

अलग-अलग जनगणना में ऐसी दिखी तस्वीर
2011 की जनसंख्या के अनुसार, राज्य में मुस्लिम आबादी की संख्या हिंदुओं से अधिक है और यही पैटर्न बीते पांच दशकों से कायम भी रहा है। पर अतीत के आंकड़ों पर नजर डालें तो सापेक्ष रूप से मुस्लिमों की जनसंख्या का अनुपात पांच दशकों में बढ़ा ही है। 1961 की जनगणना के अनुसार, राज्य में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत 68.3 था, जो कि 1971 में घटकर 65.8 तक पहुंचा। इसके बाद 1981 की जनगणना के दौरान कुल आबादी में मुस्लिम जनसंख्या 64.19 फीसदी हो गई। 1990 में कश्मीर में आतंकवाद का दौर शुरू हुआ तो 1991 में यहां जनगणना नहीं हो सकी। लेकिन 2001 में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत 66.9 रेकॉर्ड किया गया। 2011 में आंकड़ा बढ़ा तो आबादी में मुस्लिम जनसंख्या का प्रतिनिधित्व 68.31 तक पहुंच गया। अतीत पर गौर करें तो जम्मू-कश्मीर ने बीते 6 दशक में दो बार जनगणना में हिस्सा नहीं लिया। इसमें 1951 की जनगणना और 1991 की जनगणना शामिल है।

किस जिले में किसकी आबादी अधिक
जम्मू-कश्मीर में पूर्व में कुल 14 जिले थे। 2006 में यहां 8 जिले और बनाए गए और संख्या 22 तक पहुंच गई। इन 22 में से 17 जिले ऐसे थे, जहां मुस्लिम आबादी अधिक थी। इनमें से 10 जिले कश्मीर, 6 जम्मू और 1 लद्दाख डिविजन का हिस्सा थे। इसके अलावा जम्मू के 4 जिलों में हिंदुओं की जनसंख्या अधिक थी, जबकि लेह को बौद्ध धर्म के लोगों के जिले के रूप में जाना जाता था। हालांकि अब 5 अगस्त 2019 के फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश हैं। जम्मू-कश्मीर में कुल 20 जिले हैं, जबकि लद्दाख में करगिल और लेह दो जिले हैं।

किसकी क्या दलील
आशंकाएं और जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक पार्टियां ये कह रही हैं कि राज्य में अगर दूसरे राज्य के लोगों को जमीन खरीदने या घर बनाने का अधिकार मिला तो यहां की डेमोग्राफिक स्थितियां बदलेंगी। राज्य में गैर प्रांतीय लोगों के आने से यहां के लोगों का प्रतिनिधित्व सापेक्ष रूप से कम होगा। राजनीतिक दल इसी को मुद्दा बनाकर जम्मू-कश्मीर के लोगों को संदेश देने की कोशिश भी कर रहे हैं और कहा जा रहा है कि गैर प्रांतीय लोगों के यहां आने से स्थानीय लोगों का प्रभाव कम होगा। हालांकि दूसरी ओर केंद्र का कहना है कि नए कानून के आने से जम्मू-कश्मीर में विकास की संभावनाएं खुलेंगी। जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के मुताबिक, हम चाहते हैं कि बाहर की इंडस्ट्री जम्मू-कश्मीर में लगे। इसलिए इंडस्ट्रियल लैंड में निवेश की जरूरत है। हालांकि खेती की जमीन सिर्फ राज्य के लोगों के लिए ही रहेगी।

नए कानून की पूरी बात समझिए
नए कानून के मुताबिक अब देश का कोई भी नागरिक जम्मू-कश्मीर में अपने घर या कारोबार के लिए जमीन खरीद सकता है। 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 और 35-ए के प्रावधान खत्म होने के बाद इस बात की पूरी संभावना थी कि जल्द ही कश्मीर में जमीन की खरीद-फरोख्त की इजाजत भी दे दी जाएगी। अगस्त 2019 से पहले जम्मू-कश्मीर की एक अपनी अलग संवैधानिक व्यवस्था थी। उसके तहत जम्मू-कश्मीर के सिर्फ स्थायी नागरिकों (जिनके पास राज्य का स्थायी नागरिकता प्रमाण पत्र हो) को ही जमीन खरीदने की अनुमति थी। किसी अन्य राज्य का कोई नागरिक चाहकर भी जम्मू-कश्मीर में अपने घर, दुकान, कारोबार या खेतीबाड़ी के लिए जमीन नहीं खरीद सकता था। सोमवार शाम केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस संदर्भ में अधिसूचना जारी कर दी है। इसके तहत देश के किसी भी राज्य का कोई भी नागरिक अब बिना किसी मुश्किल मकान-दुकान बनाने या कारोबार के लिए जमीन खरीद सकता है। इसके लिए अब किसी भी तरह के डोमिसाइल या स्टेट सब्जेक्ट की औपचारिकता की जरूरत नहीं होगी। हालांकि डोमिसाइल की अनिवार्यता सिर्फ कृषि भूमि की खरीद के लिए होगी।