मोदी-नीतीश की इस तस्वीर का हर कोई लिख रहा कैप्शन, रिश्तों में उतार-चढ़ाव की दिला रही याद

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नई दिल्ली
बिहार विधानसभा चुनाव के लिए पार्टियों और गठबंधनों का प्रचार युद्ध शबाब पर पहुंच चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शुक्रवार को प्रचार अभियान में कूदे और 3 रैलियों को संबोधित किया। इस दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ उनकी एक तस्वीर सोशल मीडिया पर बहुत चर्चित हो रही है। यूजर इस तस्वीर को शेयर करते हुए कैप्शन पूछ रहे हैं। कांग्रेस ने भी पूछा है।

चुनाव अभियान के दौरान पीएम मोदी और नीतीश एक साथ एक मंच पर दिखे। पीएम मोदी ने अपने भाषणों में नीतीश की जमकर तारीफ की। उन्हें बिहार में कोरोना के खिलाफ ‘कामयाब जंग’ का क्रेडिट दिया। यह भी बताया कि नीतीश को क्यों महागठबंधन को छोड़कर फिर से एनडीए के साथ आना पड़ा। इसी दौरान की एक तस्वीर चर्चित हो रही है जिसमें दोनों नेता कुछ बात करते दिखाई दे रहे हैं। नीतीश अपना एक हाथ ऊपर उठाए हैं और उनकी तर्जनी उंगली बाहर निकली हुई है। पीएम मोदी भी हाथ उठाकर बात कर रहे हैं और तस्वीर में उनकी तर्जनी उंगली नीतीश के ललाट की ओर इशारा करती दिख रही है। इस तस्वीर को देखकर दोनों नेताओं के रिश्तों में उतार चढ़ाव की कहानी का कौंधना लाजिमी है।

2010 में नीतीश ने मोदी को बिहार में एनडीए का प्रचार नहीं करने दिया था
जेडीयू बीजेपी के सबसे पुराने सहयोगियों में से एक है। नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी के रिश्ते काफी उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। 2002 में मोदी के मुख्यमंत्री रहते जब गुजरात में दंगे हुए थे तब नीतीश केंद्र में अटल सरकार में मंत्री थे। तब ‘सांप्रदायिकता’ का हवाला देकर रामविलास पासवान ने केंद्रीय मंत्री का पद छोड़ दिया था और एनडीए से अपने रास्ते अलग कर लिए लेकिन नीतीश मंत्री बने रहे। यहां तक कि गुजरात में मोदी-नीतीश एक साथ कुछ मंचों पर भी दिखाई दिए लेकिन बाद में जब नीतीश बिहार के मुख्यमंत्री बने तब वह मोदी के साथ सार्वजनिक तौर पर दिखने से बचते रहे। यही वजह रही कि 2010 के चुनाव में मोदी बिहार में कहीं नहीं दिखे।

जब बीजेपी से अलग हुए थे नीतीश
यूपीए-2 सरकार के आखिरी वर्षों में जब कथित भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर जनता में गुस्सा था तब सियासी पंडितों का एक तबका नीतीश में देश का भावी प्रधानमंत्री देख रहा था। शायद नीतीश भी खुद को भावी पीएम के तौर पर देख रहे थे। तभी सितंबर 2013 में बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। इससे भड़के नीतीश ने इसे ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धि’ करार दिया और 17 वर्षों के लंबे साथ के बाद बीजेपी से अपनी राहें अलग कर लीं। 2015 में नीतीश ने आरजेडी और कांग्रेस के साथ बने महागठबंधन का नेतृत्व किया। तब चुनाव में मोदी और नीतीश में तीखी जुबानी जंग देखने को मिली। आखिरकार महागठबंधन ने जबरदस्त जीत हासिल की और नीतीश फिर मुख्यमंत्री बने। तब वह मोदी लहर को थामने वाले नेता के रूप में उभरे और विपक्षी दलों के पोस्टर बॉय बन गए। हालांकि, 18 महीने में ही जेडीयू-आरजेडी में कड़वाहट इतनी बढ़ गई कि नीतीश को मजबूरन फिर बीजेपी का दामन थामना पड़ा।

एक तस्वीर यह भी
2015 के चुनाव में बीजेपी को करारी शिकस्त देकर नीतीश फिर मुख्यमंत्री बने। लेकिन जल्द ही आरजेडी के साथ उनके रिश्तों में कड़वाहट आने लगी। एक तरफ आरजेडी के साथ उनकी खटास बढ़ रही थी तो दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी के प्रति नरमी। 2016 में पीएम मोदी के नोटबंदी के फैसले का जब विपक्षी दलों ने तीखा विरोध किया तब नीतीश ने पीएम का समर्थन किया। जनवरी 2017 में गुरु गोविंद सिंह के प्रकाशोत्सव पर मोदी और नीतीश एक मंच पर दिखे। दोनों ने एक दूसरे की तारीफों के पुल बांधे। नीतीश ने नोटबंदी तो पीएम ने बिहार में शराबबंदी की तारीफ में कसीदे गढ़े। उस दौरान की दोनों की एक साथ तस्वीर भी खूब चर्चित हुई थी और तभी से अटकलें लगने लगीं कि नीतीश फिर बीजेपी के साथ जा सकते हैं। हुआ भी ऐसा। 18 महीने तक महागठबंधन की सरकार चलाने के बाद नीतीश 2017 में फिर एनडीए के साथ आ गए।

पीएम मोदी ने बताया, नीतीश को क्यों फिर आना पड़ा साथ
शुक्रवार को प्रधानमंत्री मोदी ने सासाराम की रैली में बताया कि 2017 में नीतीश को महागठबंधन से क्यों नाता तोड़ना पड़ा। आरजेडी पर हमला करते हुए उन्होंने कहा कि इन लोगों ने बिहार को 15 सालों तक लूटा। मान-मर्दन किया। सत्ता को तिजोरी भरने का जरिया बना लिया लेकिन जब जनता ने इन्हें सत्ता से बाहर किया तो ये लोग बौखला गए। उनके अंदर गुस्सा भर गया, जहर भर गया। इसके बाद 10 सालों तक इन लोगों ने दिल्ली में यूपीए सरकार के रहते हुए बिहारवालों पर अपना गुस्सा निकाला।

नीतीश के महागठबंधन छोड़ने की वजह बताते हुए मोदी ने कहा, ’18 महीनों में क्या-क्या हुआ, ये मुझे कहने की जरूरत नहीं है। इन अठारह महीनों में परिवार ने क्या-क्या किया और कैसे-कैसे खेल किए, कौन सी बातें अखबारों छाई रहती थीं, कौन सी बातें टीवी वालों को भाती थीं, ये बातें किसी से छिपी नहीं है। जब नीतीश जी इस खेल को भांप गए, समझ गए कि इन लोगों के साथ रहते हुए बिहार का भला तो छोडिए, बिहार और 15 साल पीछे चला जाएगा, तो उन्हें सत्ता छोड़ने का फैसला लेना पड़ा।’