Explainer: बिहार में सियासी घमासान के बीच जानिए पार्टियों को कैसे मिलता है चुनाव चिन्ह?

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नई दिल्ली
बिहार विधानसभा चुनाव () को लेकर सियासी गहमागहमी तेज होती जा रही है। पहले चरण की नामांकन प्रक्रिया संपन्न होने के साथ अब दूसरे चरण को लेकर सियासी दलों की ओर से रणनीतिक तैयारी की जा रही है। वहीं बिहार की चुनावी जंग में बीजेपी का ‘कमल’, जेडीयू का ‘तीर’, आरजेडी का ‘लालटेन’ और साथ ही कांग्रेस के ‘हाथ’ के चुनावी सिंबल के रूप जंग दिखने वाली है। वहीं दूसरी तरफ बिहार के जागरूक मतदाता 28 अक्टूबर, 3 नवंबर और 7 नवंबर को जब मतदान के लिए जाएंगे तो उन्हें ईवीएम मशीन पर चपाती, रोलर, गुल्ली, चूड़ियाँ, शिमला मिर्च जैसे ढेरों चुनाव चिन्ह नजर आएंगे। तो आइए जानते हैं कि आखिरकार कैसे ये चुनाव चिह्न पार्टियों और उम्मीदवारों को दिए जाते हैं-

दरअसल आगामी बिहार चुनाव 2020 के लिए 60 अलग-अलग पार्टियों ने चुनावी अखाड़े में अपनी ताकत झोंक दी है। इनमें कई गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियां और स्वतंत्र उम्मीदवार अपने सटीक चुनाव चिह्न के चुनाव आयोग से जोर-आजमाइश में लगे रहते हैं। सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली एक गैर-मान्यता प्राप्त भारतीय आम आवाम पार्टी को चुनाव आयोग ने ‘शिमला मिर्च’ का चुनाव चिह्न आवंटित किया है। इसी तरह, “मूसल और मोर्टार” का चुनाव चिह्न एक अन्य गैर-मान्यता प्राप्त हिंदू समाज पार्टी को आवंटित किया गया है, जबकि आम आदमी मोर्चा और राष्ट्रीय जन विकास पार्टी ‘चपाती’ ‘रोलर’ और ‘बेबी वॉकर’ प्रतीकों पर लड़ेंगे।

चुनाव आयोग की भूमिका
भारत का चुनाव आयोग राजनीतिक पार्टियों को मान्यता देता है और चुनाव चिह्न भी आवंटित करता है। चुनाव आयोग को संविधान के आर्टिकल 324, रेप्रजेंटेशन ऑफ द पीपुल ऐक्ट, 1951 और कंडक्ट ऑफ इलेक्शंस रूल्स, 1961 के माध्यम से शक्ति प्रदान की गई है। इन शक्तियों का इस्तेमाल करके चुनाव आयोग ने चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 जारी किया था। देश के अंदर राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों को चुनाव चिह्न इसी के तहत आवंटित किया जाता है।

चुनाव आयोग कैसे आवंटित करता है चुनाव चिह्न?
चुनाव आयोग के पास चुनाव चिह्नों की दो तरह सूची होती है। बीते सालों में आवंटित हो चुके निशानों की आयोग के पास एक सूची होती है। दूसरी सूची ऐसे निशानों की होती है जिसे किसी को भी आवंटित नहीं किया गया है। किसी भी समय चुनाव आयोग के पास कम से कम ऐसे 100 निशान होते हैं, जो अब तक किसी को आवंटित नहीं किए गए हैं। निशानों का चुनाव इस बात को ध्यान में रखकर किया जाता है कि वे आसानी से मतदाताओं को याद रहे और आसानी से वे उनको पहचान जाएं।

..इसलिए जेडीयू को मिला था ‘ट्रम्पेट’
शिवसेना जिसे पिछले साल चुनाव आयोग द्वारा बिहार में लोकसभा चुनावों के लिए अपने ‘धनुष और तीर’ का उपयोग करने से रोक दिया गया था। जेडीयू के प्रतीक के साथ अपनी समानता का हवाला देते हुए,’ट्रम्पेट’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया था। पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी लोकतांत्रिक को इस बार ‘कैंची’ चुनाव चिह्न जारी किया गया है। 2015 के चुनावों में ये पार्टी एक ‘हॉकी स्टिक और बॉल’ चुनाव चिह्न पर लड़ी थी।

चुनावों में प्रतीकों का क्या महत्व है?
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में जहां कई चुनावों और छोटे राजनीतिक दलों ने राज्य के चुनावों में अपनी किस्मत आजमाई है। वहीं चुनाव चिह्न मतदाताओं से जुड़ने के लिए महत्वपूर्ण प्रचार उपकरण है। 1951-52 में भारत के पहले राष्ट्रीय चुनाव आयोजित करने के बाद से ‘चुनाव चिह्न’ चुनाव प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए हैं, लेकिन उस समय लगभग 85 प्रतिशत मतदाता साक्षर नहीं थे, इसलिए पार्टी और उम्मीदवारों को उनकी पसंद की पार्टी की पहचान करने में मदद करने के लिए दृश्य चुनाव चिन्ह आवंटित किए गए थे।

प्रतीक कितने प्रकार के होते हैं?
चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) संशोधन आदेश 2017 के मुताबिक पार्टी के प्रतीक या तो ‘आरक्षित’ या ‘मुक्त’ हैं। जबकि देश भर में आठ राष्ट्रीय दलों और 64 राज्य दलों के पास ‘आरक्षित’ प्रतीक हैं, चुनाव आयोग के पास लगभग 200 ‘मुक्त’ प्रतीकों का एक पूल है जो चुनाव से पहले हजारों गैर-मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय दलों को आवंटित किया जाता है। EC के अनुसार, भारत में 2,538 गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियां हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी विशेष राज्य में मान्यता प्राप्त पार्टी किसी अन्य राज्य में चुनाव लड़ती है, तो वह उसके द्वारा उपयोग किए जा रहे प्रतीक को ‘आरक्षित’ कर सकता है, बशर्ते कि प्रतीक का उपयोग नहीं किया जा रहा हो या किसी अन्य पार्टी के समान हो।

राजनीतिक दलों को कैसे प्रतीक आवंटित किए जाते हैं?
पहली बार1968 में घोषित आदेश, चुनाव आयोग को “राजनीतिक दलों की मान्यता के लिए संसदीय और विधानसभा चुनावों में निर्देश, आरक्षण, विकल्प और चुनाव चिन्ह के आवंटन के लिए प्रदान करता है। दिशा निर्देशों के अनुसार, आवंटित किए गए प्रतीक को प्राप्त करने के लिए, एक पार्टी / उम्मीदवार को नामांकन पत्र दाखिल करने के समय चुनाव आयोग की मुक्त प्रतीकों सूची में से तीन प्रतीकों की एक लिस्ट देनी होती है। उनमें से, एक प्रतीक को पहले आओ-पहले पाओ के आधार पर पार्टी / उम्मीदवार को आवंटित किया जाता है।

जब पार्टी टूटने की नौबत आ जाए तो क्या करता है चुनाव आयोग?
जब कोई मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी विभाजित होती है, तो चुनाव आयोग चुनाव चिन्ह पर निर्णय लेता है। उदाहरण के लिए, जब समाजवादी पार्टी अलग हो गई, तो चुनाव आयोग ने अखिलेश यादव गुट को ‘साइकिल’ आवंटित की थी। इसी तरह, जयललिता की मौत के बाद, AIADMK दो गुटों में विभाजित हो गई और दोनों ने प्रतिष्ठित दो चुनाव चिन्ह पर दावा ठोक दिया, जिससे चुनाव आयोग को प्रतीक को फ्रीज करना पड़ा। सुनवाई के बाद, चुनाव आयोग ने पलानीस्वामी-पन्नीरसेल्वम गुट को दो पत्तियों का प्रतीक आवंटित किया।